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बजट 2025-26 में इनकम टैक्स का इतिहास और बड़े बदलाव

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भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 (Budget 2025-26) के तहत इनकम टैक्स प्रणाली में ऐसे महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं, जो देश के कराधान इतिहास में एक बड़ा मुकाम मानے जा रहे हैं और मध्यम वर्ग सहित आम टैक्सदाताओं को राहत दे रहे हैं। आजादी के बाद से आयकर के नियम समय-समय पर बदलते आए हैं, और इस बजट में भी इन बदलावों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया है — जिसमें नया नियम मध्यम आय तक टैक्स मुक्त करने से शुरू होकर टैक्स स्लैब की संरचना, छूट और छूट की व्यापकता तक शामिल है।

आजादी के शुरुआती सालों में भारत का पहला बजट 16 नवंबर 1947 को पेश किया गया था, जब तब केवल ₹1,500 तक की आमदनी टैक्स-फ्री थी और आर्थिक परिस्थितियाँ बेहद जटिल थीं। उस समय से लेकर अब तक आयकर नियम कई बार बदले गए हैं, जिनमें शादीशुदा और कुंवारों के लिए अलग-अलग टैक्स नियम शामिल रहे, और बच्चों की संख्या के आधार पर छूट देने जैसे विशिष्ट प्रावधान भी लागू हुए।

पिछले वर्ष वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2025 में नई टैक्स संरचना का ऐलान किया, जिसके तहत सैलरी-क्लास करदाताओं के लिए 12 लाख रुपये तक की आय को टैक्स-फ्री कर दिया गया। इसके पीछे की वजह यह है कि नई टैक्स स्लैब और स्टैंडर्ड डिडक्शन (₹75,000) के लाभ को एक साथ मिलाकर ₹12.75 लाख तक की आय पर कर देयता को effectively शून्य किया गया।

नए नियमों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 के लिए संशोधित इनकम टैक्स स्लैब में ₹4 लाख तक की आय पर कोई टैक्स नहीं, ₹4-8 लाख पर 5%, ₹8-12 लाख पर 10%, ₹12-16 लाख पर 15%, ₹16-20 लाख पर 20%, और ₹24 लाख से ऊपर पर 30% टैक्स लगाया जाता है। इन स्लैब बदलावों के कारण मध्यम वर्ग को सीधी राहत मिली है और टैक्स-पेयर्स के लिए अनुपालन भी सरल हुआ है।

विशेष रूप से, Section 87A rebate के तहत ₹12 लाख तक की कुल आय पर पूरी तरह से वापसी (rebate) प्राप्त करके कर का बोझ शून्य हो जाता है, जिससे पहले की अपेक्षा टैक्स देयता में भारी कमी आई है। इस बदलाव से मध्यम वर्ग के रिटर्न दाताओं के हाथ में अधिक बचत राशि रहती है, जिससे उपभोग और निवेश को बढ़ावा मिलता है।

इन बदलावों के इतिहास को समझने पर पता चलता है कि भारत के इनकम टैक्स नियम समय-समय पर सामाजिक और आर्थिक जरूरतों के अनुसार बदलते रहे हैं। 1955 में शादीशुदा और कुंवारों के लिए अलग स्लैब लागू किए गए थे, और 1958 में बच्चों की संख्या के आधार पर टैक्स छूट देना शुरू हुआ था — यह वो प्रावधान थे जो उस समय ‘जनसंख्या नीति’ के दृष्टिकोण से लागू किए गए।

आज के बजट में टैक्स राहत की यह प्रक्रिया आधुनिक अर्थव्यवस्था और बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप है। सरकार ने टैक्स स्लैब को इतना सरल और मध्यम-हितैषी बनाया है कि ₹12.75 लाख तक की वार्षिक आय वाले संभवतः टैक्स मुक्त स्थिति में आ सकते हैं।

इन बदलावों के प्रभाव से अब भारत के कराधान ढांचे में एक बड़ी छूट स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो टैक्स-पेयर्स के लिए राहत और वित्तीय योजना की संभावनाओं को बढ़ाती है। आने वाले बजट सत्रों में इन नियमों के क्रियान्वयन और सुधारों पर और चर्चा होगी, लेकिन फिलहाल यही बदलाव करदाताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण और राहत देने वाला कदम माना जा रहा है।

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