दक्षिणी बांग्लादेश के पिरोजपुर जिले में सोमवार देर रात स्थानीय हिंदू अल्पसंख्यक परिवार के कम से कम पांच घरों को आग के हवाले कर दिया गया, जिससे पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और सामाजिक तनाव की स्थिति पैदा हो गई है। यह घटना उस समय उजागर हुई है जब देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों में इज़ाफा देखा जा रहा है और मानवाधिकार समूहों ने इसकी दस्तावेजी रिपोर्ट भी पेश की है। आगजनी की घटना की आधिकारिक जांच अभी चल रही है, लेकिन स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि कथित हमलावरों ने पहले घर के एक कमरे में कपड़े डालकर आग लगाई, जिससे आग जल्दी फैल गई और चार अन्य घरों को भी नुकसान पहुँचा। फिलहाल इस आगजनी में कोई मानव-हानि नहीं हुई, लेकिन घरों के सभी घरेलू सामान, फर्नीचर, दस्तावेज और व्यक्तिगत वस्तुएं खाक हो गई हैं।
स्थानीय पुलिस अधिकारी मोहम्मद मंज़ूर अहमद सिद्दीकी ने मौके का दौरा किया और पीड़ितों को आश्वासन दिया कि इस घटना की तेज़ और पारदर्शी जांच करायी जाएगी। पुलिस ने अब तक कुछ संदिग्धों को गिरफ्तार भी किया है और बाकी आरोपियों की तलाश जारी है। घटना की एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई है, जिसमें स्थानीय लोग आग बुझाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
यह आगजनी अकेली घटना नहीं मानी जा रही है, बल्कि देशभर में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते हमलों की एक कड़ी के रूप में देखी जा रही है। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स कांग्रेस फॉर बांग्लादेश माइनॉरिटीज (HRCBM) की रिपोर्ट के अनुसार, जून से दिसंबर 2025 तक कम से कम 71 ईशनिंदा-संबंधित मामलों में हिंदू अल्पसंख्यकों को टारगेट किया गया है, जिसमें तलवारबाज़ी, भीड़ हिंसा और बदनाम करने के प्रयास शामिल हैं।
पिछले कुछ हफ्तों में इसी प्रकार की कई घटनाएँ सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर, चटगाँव के रावजान इलाके में भी हिंदू परिवारों के घरों को आग के हवाले किया गया था और धमकियों के साथ चेतावनी-बैनर भी छोड़ा गया था, जिससे अल्पसंख्यक समुदाय में गहरी डर और असुरक्षा की भावना फैल गई।
विशेषज्ञों के अनुसार, इन घटनाओं के पीछे सामाजिक-राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक भावना की उभरती कट्टरता और सामुदायिक संघर्ष का विस्तार जिम्मेदार हो सकता है। रिपोर्ट्स में यह भी संकेत मिले हैं कि बांग्लादेश में राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और आरोपों के मामलों में इज़ाफा हुआ है, जिससे स्थानीय समुदायों में आतंक और विभाजन की भावना बढ़ रही है।
हालाँकि बांग्लादेश सरकार ने कई बार यह कहा है कि यह “अलग-थलग” घटनाएँ हैं, लेकिन दैनिक जीवन में लगातार मिल रही ऐसी खबरों ने अल्पसंख्यक सुरक्षा, धार्मिक सहिष्णुता और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों, पड़ोसी देशों और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भी बांग्लादेश की अल्पसंख्यक नीति और सुरक्षा उपायों पर ध्यान केंद्रित होने लगा है।
यह घटना न केवल बांग्लादेश के अंदरूनी सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित कर सकती है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों और दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा चर्चा को भी नई दिशा दे सकती है। कई विश्लेषक मानते हैं कि इन घटनाओं का समाधान निकालना सिर्फ प्रशासनिक कदमों से संभव नहीं है, बल्कि सामुदायिक संवाद, शिक्षा और सामाजिक समावेशन की नीतियाँ अपनाने की भी आवश्यकता है ताकि लंबे समय तक ऐसे खतरनाक तनाव से बचा जा सके।
