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भूमिका-वीर Bhagat Singh की तुलना ‘Hamas’ से करने पर उभरी राजनीतिक गहमागहमी — Sanjeev Balyan ने दिए तीखे शब्द

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उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फरनगर से एक विवादित बयान सामने आया है, जिसने राजनीतिक-सामाजिक चर्चा को तूल दे दिया है। Imran Masood नामक सांसद द्वारा आजादी के महान क्रांतिकारी भगत सिंह की तुलना आतंकवादी संगठन ‘Hamas’ से किए जाने के बाद, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता संजीव बालियान ने इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

Imran Masood ने एक सार्वजनिक बयान में कहा था कि “भगत सिंह जैसे लोग आतंकवाद की रीढ़ थे” (उल्लेखनीय है कि यह कहा गया था कि उनके संगठनात्मक रुख को Hamas से जोड़ सकते हैं)–जिसे संजीव बालियान ने तुरंत ‘देश-विरोधी’ और ‘अनुचित तुलना’ बताया। उन्होंने कहा कि ‘भगत सिंह हमारी आजादी के प्रेरक स्रोत हैं और उनकी तुलना किसी आतंकी संगठन से करना बेहद शर्मनाक है।’

बालियान ने कहा कि आज़ादी के लिए शहीद हुए क्रांतिकारियों को आतंकवादी कहकर मटियामेट कर देना समूचे देश-युवाओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है। उनके मुताबिक, “यदि आजादी-संग्राम-वीरों की गरिमा पर चोट पहुँचती है, तो यह सामाजिक समरसता और इतिहास-सम्मान दोनों के लिए खतरनाक संकेत है।”

इस विवाद ने केवल दो व्यक्तियों के बीच सम्मान-अभिमत का प्रश्न नहीं खड़ा किया है, बल्कि यह इस बात को भी उजागर करता है कि कैसे राजनीति-मंच पर ऐतिहासिक प्रतीकों, वीरों तथा उनकी विरासत को नए-संदर्भ में पेश किया जा रहा है। मुज़फ़्फरनगर के इस विवाद का एक बड़ा आयाम यह है कि यदि कभी-कभी भाषण-मंच पर अतिशयोक्ति या भ्रमित तुलना हो जाए, तो सामाजिक संवेदनाओं को ठेस पहुँच सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह की बयानबाजी आगामी चुनावों की पृष्ठभूमि में भी देखी जा रही हैं—जहाँ प्रतीक-वीरों की छवि, धर्म-संवेदनशीलता और राजनीतिक दलों की मोटर चालित रणनीति-सब एक साथ काम कर रहे हैं। इस दृष्टि से Imran Masood का बयान सिर्फ व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक पैंतरे का हिस्सा माना जा रहा है।

बालियान ने निजी जीवन-संवर्धन का खुलासा भी किया है — उन्होंने बताया कि करीब 20 साल बाद उन्होंने पुनः एलएलबी की पढ़ाई शुरू की है, क्योंकि उनका मानना है कि “पढ़ने की कोई उम्र नहीं होती।” यह बयान इस तथ्य को भी उजागर करता है कि राजनीतिक हस्तियों का सामाजिक-शिक्षात्मक पक्ष भी जनता-सामने महत्वपूर्ण प्रतीक बनता जा रहा है।

इस पूरी घटना का सामाजिक-प्रभाव भी ध्यान देने योग्य है। आजादी-के योद्धाओं के सम्मान के प्रश्न पर जब विवाद खड़ा होता है, तो वह युवाओं में इतिहास-बोध, प्रतीक-सम्मान और सामाजिक-यथार्थ के बीच टकराव को भी उजागर करता है। यदि इस तरह की तुलना-भाषा का प्रवाह जारी रहा, तो सामाजिक भाव-भूमि पर अनचाहे विभाजन भी खड़े हो सकते हैं।

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