
बिहार में कांग्रेस का अस्तित्व संकट में
बिहार की सियासत में एक बड़ा राजनीतिक भूचाल आता दिख रहा है, जहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) के सभी छह विधायक विधानसभा में सत्ताधारी NDA (राष्ट्रीय जनता दल एवं उसके सहयोगी) में शामिल होने की अटकलें जोरों पर हैं। अगर यह अटकलें सच साबित होती हैं, तो कांग्रेस का विधानसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं बचेगा और पार्टी का अस्तित्व राज्य की राजनीति में गंभीर संकट में आ जाएगा। यह खबर ऐसे समय में सामने आई है जब पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में कांग्रेस को मात्र छह ही सीटें मिली थीं, जो उसके लिए ऐतिहासिक रूप से सबसे खराब प्रदर्शन रहा।
सूत्रों के अनुसार, पिछले कुछ हफ्तों से कांग्रेस विधायकों की बैठकों में उनके गैर-हाज़िर रहने, पार्टी के कार्यक्रमों में उनकी अनुपस्थिति और NDA सदस्यों से संपर्क बनाए रखने जैसे संकेत राजनीति में चर्चाओं को और तेज़ कर रहे हैं। खासकर मकर संक्रांति के पारंपरिक आयोजन में कांग्रेस के विधायकों की कमी ने यह आशंका और बढ़ा दी है कि जल्द विधायकों की पार्टी बदलने की घोषणा हो सकती है। हालांकि कांग्रेस नेतागण इन चर्चाओं का ख़ंडन कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसके प्रभाव को गंभीरता से लिया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर सभी छह विधायक Janata Dal (United) यानी JDU में शामिल हो जाते हैं, तो कांग्रेस का बिहार विधानसभा में कोई भी विधायक नहीं बचेगा, जिससे पार्टी का राज्य में अस्तित्व प्रतीकात्मक रूप से समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही यह दल बदल विरोधी नियमों (anti-defection law) के तहत अधिकृत विभाजन को भी ट्रिगर कर सकता है, जिससे कांग्रेस तो कमजोर होगी ही, महागठबंधन के विपक्षी खेमे को भी और बड़ा झटका मिलेगा।
पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने कुल 61 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे केवल छह ही सीटें मिलीं — वाल्मीकि नगर, चनपटिया, फॉरब्सगंज, अराबरिया, किशनगंज और मणिहारी — जिससे पार्टी की स्थिति पहले से ही कमजोर थी। राजनीतिक समीकरणों पर नजर रखने वाले लोग मानते हैं कि इन विधायकों के संभावित दल बदलने से बिहार में विपक्ष की भूमिका और भी हाशिए पर चली जाएगी, क्योंकि पहले से ही राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सहित अन्य महागठबंधन घटक कमजोर स्थिति में हैं और अब कांग्रेस का संकट इन्हें और प्रभावित कर सकता है।
इन परिस्थितियों में यह भी संभावना जताई जा रही है कि यदि सभी छह विधायक JDU नहीं भी जाते हैं, तो आंशिक रूप से कुछ का अलग गुट बनाकर NDA की ओर रुख कर लेना भी पार्टी के लिए विनाशकारी परिणाम ला सकता है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस न केवल विधानसभा में अपनी संख्या खो देगी, बल्कि राज्य की राजनीति में अपनी पहचान को भी चुनौतीपूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार इस खबर ने केवल कांग्रेस के विधायक स्तर पर ही नहीं बल्कि पूरे महागठबंधन की रणनीति पर भी पाकिस्तान रख दिया है, क्योंकि कांग्रेस पहले से ही बिहार विधानसभा में कमजोर थी और RJD-लोगों को भी अपने समर्थन को मजबूती से जोड़ने की चुनौती का सामना करना पड़ा है। अगर यह विधायकों के पार्टी छोड़ने की ख़बर सही निकली, तो उच्च-स्तरीय सियासी पहेली भाजपा-JDU के पक्ष में और मजबूत हो सकती है, जो बिहार में आगामी राजनीतिक समीकरणों को और बदल सकती है।
कुल मिलाकर, बिहार में कांग्रेस के 6 विधायकों के NDA या JDU में शामिल होने के संभावित कदम से राज्य की राजनीति में नई चुनौतियाँ और सियासी विवाद उत्पन्न होने की उम्मीद है, जो आने वाले समय में साफ़ तस्वीर सामने रखेंगे।



