देश की राजनीति में फंडिंग को लेकर एक बार फिर बड़ा खुलासा हुआ है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है, लेकिन इसमें सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खाते में गया है। रिपोर्ट के अनुसार, 20 हजार रुपये से अधिक के घोषित चंदे में बीजेपी को 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा मिला, जो अन्य सभी राष्ट्रीय दलों की तुलना में बेहद ज्यादा है।
रिपोर्ट बताती है कि इस अवधि में राजनीतिक दलों को मिलने वाले कुल चंदे में करीब 161 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो अपने आप में एक बड़ा आंकड़ा है। हालांकि इस बढ़ोतरी का लाभ मुख्य रूप से बीजेपी को मिला, जिससे देश की राजनीतिक फंडिंग के संतुलन पर सवाल उठने लगे हैं।
ADR के विश्लेषण के मुताबिक, इससे पहले भी बीजेपी लगातार चंदे के मामले में अन्य दलों से काफी आगे रही है। उदाहरण के तौर पर, 2023-24 में बीजेपी को करीब 2243 करोड़ रुपये का चंदा मिला था, जो कांग्रेस समेत अन्य दलों के कुल चंदे से कई गुना ज्यादा था।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कॉरपोरेट और बड़े दानदाताओं का योगदान राजनीतिक फंडिंग में सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। खासतौर पर इलेक्टोरल ट्रस्ट्स के जरिए मिलने वाले फंड में भी बीजेपी का दबदबा साफ दिखता है। 2024-25 में इन ट्रस्ट्स द्वारा वितरित कुल फंड का करीब 82 प्रतिशत हिस्सा बीजेपी को मिला, जबकि बाकी राशि अन्य दलों में बंटी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फंडिंग में इस तरह का असंतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। जब एक ही पार्टी को अत्यधिक आर्थिक समर्थन मिलता है, तो चुनावी प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है और छोटे दलों के लिए बराबरी की लड़ाई कठिन हो जाती है।
इसके साथ ही रिपोर्ट में पारदर्शिता को लेकर भी चिंता जताई गई है। कई मामलों में दानदाताओं की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं होती, खासकर छोटे दान के मामलों में, जिससे राजनीतिक फंडिंग का एक हिस्सा अब भी “अज्ञात स्रोत” के रूप में बना रहता है।
गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलेक्टोरल बॉन्ड योजना को खत्म करने के बाद भी राजनीतिक चंदे का प्रवाह जारी है और इसमें बड़े कॉरपोरेट योगदान की भूमिका अहम बनी हुई है।
कुल मिलाकर, ADR की यह रिपोर्ट देश की राजनीतिक फंडिंग के मौजूदा स्वरूप को उजागर करती है, जिसमें बीजेपी का वर्चस्व साफ नजर आता है। आने वाले समय में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है, खासकर पारदर्शिता और चुनावी समानता के सवालों को लेकर।
