कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए जूडो में इतिहास रच दिया। भारत की अस्मिता डे और हर्ष सिंह ने अपने-अपने वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर देश को एक ही दिन में दो गोल्ड मेडल दिलाए। यह उपलब्धि भारतीय जूडो के इतिहास में बेहद खास मानी जा रही है, क्योंकि पहली बार भारत ने कॉमनवेल्थ गेम्स में जूडो स्पर्धा में दो स्वर्ण पदक अपने नाम किए हैं। दोनों खिलाड़ियों की जीत के बाद भारतीय दल में उत्साह का माहौल है और खेल प्रेमियों ने भी इस उपलब्धि का जोरदार स्वागत किया।
महिला 48 किलोग्राम वर्ग में अस्मिता डे ने फाइनल मुकाबले में कनाडा की हेइडी क्वाच को बेहद रोमांचक मुकाबले में 2-1 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। निर्धारित समय तक मुकाबला बराबरी पर रहने के बाद गोल्डन स्कोर में अस्मिता ने शानदार तकनीक और संयम का परिचय देते हुए जीत हासिल की। इस जीत के साथ वह कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में जूडो में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। उनकी यह उपलब्धि भारतीय जूडो के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर मानी जा रही है।
वहीं पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में हर्ष सिंह ने भी दमदार प्रदर्शन करते हुए फाइनल मुकाबला जीतकर भारत के लिए दूसरा स्वर्ण पदक हासिल किया। पूरे टूर्नामेंट में हर्ष ने शानदार आत्मविश्वास, मजबूत रक्षा और बेहतरीन तकनीकी कौशल का प्रदर्शन किया। फाइनल में भी उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी पर शुरुआत से ही दबाव बनाए रखा और निर्णायक बढ़त हासिल करते हुए भारत की झोली में दूसरा गोल्ड डाल दिया। उनकी इस जीत ने भारतीय जूडो टीम के शानदार अभियान को और यादगार बना दिया।
इससे पहले दिन की शुरुआत भी भारत के लिए शानदार रही थी, जब अस्मिता डे, हर्ष सिंह और यामिनी मौर्य अपने-अपने वर्ग के फाइनल में पहुंचकर भारत के लिए कम से कम तीन पदक पक्के कर चुके थे। बाद में अस्मिता और हर्ष ने स्वर्ण पदक जीतकर इस सफलता को और बड़ा बना दिया। वहीं यामिनी मौर्य भी अपने वर्ग में पदक जीतने की दौड़ में रहीं, जिससे भारतीय जूडो दल का प्रदर्शन इस संस्करण के सबसे सफल अभियानों में शामिल हो गया।
अस्मिता डे की सफलता की कहानी भी बेहद प्रेरणादायक है। त्रिपुरा के एक साधारण परिवार से आने वाली अस्मिता ने सीमित संसाधनों के बावजूद लगातार मेहनत की और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई। उनके पिता साइकिल मरम्मत की दुकान चलाते हैं, जबकि अस्मिता ने कठिन परिस्थितियों के बीच अपने खेल को जारी रखा। दूसरी ओर हर्ष सिंह ने भी वर्षों की कड़ी मेहनत और अनुशासित प्रशिक्षण के दम पर यह मुकाम हासिल किया। दोनों खिलाड़ियों की उपलब्धि यह साबित करती है कि प्रतिभा और दृढ़ संकल्प के सामने संसाधनों की कमी भी बाधा नहीं बनती।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए यह दोहरा स्वर्ण केवल पदक तालिका में बढ़त भर नहीं है, बल्कि यह देश में जूडो के बढ़ते स्तर का भी संकेत है। खेल विशेषज्ञों का मानना है कि इन सफलताओं से युवा खिलाड़ियों को नई प्रेरणा मिलेगी और भारत में जूडो को नई पहचान मिलेगी। भारतीय दल अब आने वाली स्पर्धाओं में भी इसी लय को बनाए रखने की कोशिश करेगा, जबकि खेल प्रेमियों की उम्मीदें अन्य भारतीय खिलाड़ियों से भी पदकों की संख्या बढ़ाने की हैं।
