दुनिया इस समय खाद्य और उर्वरक संकट की आशंका से जूझ रही है। मध्य पूर्व में जारी तनाव, ईरान युद्ध और वैश्विक सप्लाई चेन पर बढ़ते दबाव के बीच अब चीन की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। विश्व बैंक के पूर्व अध्यक्ष David Malpass ने चीन पर बड़े पैमाने पर खाद्य पदार्थों और उर्वरकों की जमाखोरी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि चीन ने अपने विशाल भंडार को नियंत्रित नहीं किया तो दुनिया के कई गरीब देशों में खाद्य संकट और भी गहरा सकता है।
डेविड मालपास ने कहा कि चीन दुनिया के सबसे बड़े खाद्य और उर्वरक भंडारों में से एक पर कब्जा रखता है। ऐसे समय में जब कई देश खाद और अनाज की कमी से जूझ रहे हैं, चीन लगातार अपने स्टॉक बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति वैश्विक बाजार में असंतुलन पैदा कर रही है और विकासशील देशों के लिए खतरा बनती जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा संकट की सबसे बड़ी वजह ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुआ तनाव है। दुनिया का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से तेल, गैस और उर्वरकों की सप्लाई पर निर्भर करता है। युद्ध और समुद्री व्यवधानों के कारण वैश्विक उर्वरक आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने भी चेतावनी दी है कि यदि स्थिति जल्द सामान्य नहीं हुई तो खाद्य कीमतों में भारी उछाल आ सकता है।
रिपोर्टों के मुताबिक चीन ने पिछले कुछ वर्षों में गेहूं, चावल, मकई और उर्वरकों का रिकॉर्ड भंडारण किया है। आलोचकों का कहना है कि बीजिंग अपनी घरेलू सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए वैश्विक बाजार से बड़ी मात्रा में खरीद कर रहा है, जिससे बाकी देशों के लिए सप्लाई कम हो रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं।
मालपास ने यह भी कहा कि चीन अब खुद को “विकासशील देश” बताकर वैश्विक संस्थाओं में विशेष रियायतें नहीं ले सकता। उन्होंने कहा कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद चीन कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विशेष छूट का फायदा उठाता है, जबकि उसके पास विशाल आर्थिक और रणनीतिक संसाधन मौजूद हैं।
इस बीच एशिया और अफ्रीका के कई देशों में खाद की कमी का असर खेती पर दिखने लगा है। थाईलैंड, बांग्लादेश, फिलीपींस और अफ्रीकी देशों के किसान बढ़ती लागत और उर्वरक संकट से परेशान हैं। कई जगह किसानों ने खेती का रकबा कम कर दिया है, जिससे आने वाले महीनों में वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उर्वरकों की कमी लंबी चली तो इसका असर केवल कृषि तक सीमित नहीं रहेगा। इससे खाद्य महंगाई, सामाजिक अस्थिरता और राजनीतिक संकट भी पैदा हो सकते हैं। इतिहास गवाह है कि 2007-08 और 2022-23 के खाद्य संकट के दौरान कई देशों में विरोध प्रदर्शन और आर्थिक उथल-पुथल देखने को मिली थी।
हालांकि चीन ने इन आरोपों पर अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन चीनी अधिकारियों का कहना है कि उनका देश केवल अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है। दूसरी ओर पश्चिमी देशों और कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि चीन की आक्रामक खरीद नीति वैश्विक संकट को और गंभीर बना रही है।
दुनिया भर की सरकारें अब इस संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक सप्लाई चेन, उर्वरक उत्पादन बढ़ाने और खाद्य भंडारण रणनीतियों पर काम कर रही हैं। लेकिन यदि मध्य पूर्व का तनाव और बढ़ता है और बड़े देश इसी तरह जमाखोरी करते रहे, तो आने वाले समय में दुनिया को नए खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है।
