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दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक माह के लिए कैंपस में विरोध प्रदर्शनों पर लगाया प्रतिबंध

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दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) प्रशासन ने एक बड़ा और विवादित कदम उठाते हुए कैंपस में एक महीने तक किसी भी तरह के विरोध प्रदर्शन और सभा-प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि यह निर्णय शांतिपूर्ण, सुरक्षित और अनुकूल शैक्षणिक माहौल सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया है ताकि पढ़ाई-लिखाई और अन्य शैक्षिक गतिविधियों में व्यवधान न उत्पन्न हो। संबंध सूत्रों के अनुसार, यह प्रतिबंध आज से अगले 30 दिनों के लिए लागू रहेगा और किसी भी छात्रों या छात्र संगठनों द्वारा बड़े समूह में प्रदर्शन या मार्च आयोजित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

प्रशासन का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों में कैंपस में बढ़ते वैचारिक मतभेदों और प्रदर्शनों के कारण विश्वविद्यालय के शांतिपूर्ण माहौल को प्रभावित होने के संकेत मिले हैं, जिससे पढ़ाई-लिखाई और विद्यार्थियों के सुरक्षित आवागमन पर असर पड़ा है। ऐसे में विश्वविद्यालय के कुलाधिपति (Vice-Chancellor) ने छात्रों से संवाद के जरिए अपने मुद्दों को शांतिपूर्ण ढंग से उठाने की अपील की है और भारी भीड़ वाले आंदोलनों पर यह प्रतिबंध लगाया है ताकि “राष्ट्रीय राजधानी के प्रमुख शैक्षणिक संस्थान में किसी भी प्रकार का अवांछित तनाव, हिंसा या उत्पात” न हो।

विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत विचार-विमर्श, शोध-समाचार और शैक्षिक चर्चाएं जारी रह सकती हैं, लेकिन किसी भी तरह का “जुलूस, रैली या विरोध प्रदर्शन” सख्ती से प्रतिबंधित रहेगा। प्रस्तावित प्रतिबंध का मकसद यह है कि एक शांत, संरक्षित और व्यवस्थित सीखने-सिखाने का वातावरण सुनिश्चित किया जा सके, खासकर उन समय में जब कई परीक्षाएँ, संगोष्ठियाँ और अकादमिक कार्यक्रम पहले से निर्धारित हैं।

कई छात्र संगठनों ने इस फैसले पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा आवश्यक कारण स्पष्ट किए बिना विरोधों पर प्रतिबंध लगाना तर्कसंगत प्रतिबंध नहीं है, और इससे छात्रों के बुनियादी अभिव्यक्ति के अधिकार पर अंकुश लग सकता है। कुछ छात्र नेताओं ने कहा कि छात्रों को अपने विचारों को शांतिपूर्ण रूप से साझा करने और समस्याएँ उठाने का अधिकार है, और यह प्रतिबंध “असुविधाजनक प्रश्नों से ध्यान हटाने” जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने प्रशासन से संवाद स्थापित कर मुद्दों को हल करने की बात कही है।

प्रशासन का दावा है कि यह कदम केवल अस्थायी है और इसका पालन कदाचार, उत्पात या हिंसा के किसी भी उद्गम को रोकने में मदद करने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को आधारहीन आरोपों के तहत दंडित नहीं किया जाएगा, और यदि कोई छात्र प्रतिबंध उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

शैक्षणिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रतिबंध कैंपस में शांति बनाए रखने का प्रयास हो सकता है, लेकिन यह भी आवश्यक है कि छात्रों के विचारों को उचित मंच और समय पर सुना जाए ताकि वैचारिक विमर्श और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा मिले। इसके अलावा, यह देखा जाना बाकी है कि क्या इस प्रतिबंध से छात्रों और प्रशासन के बीच किसी प्रकार का संवाद या समझौता स्थापित होता है, या यह निर्णय आगे भी बहस और विरोध का कारण बनेगा।

बुधवार को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों को आश्वस्त करते हुए कहा कि वे “सभी वैधानिक एवं संवैधानिक अधिकारों को सम्मानित” करना चाहते हैं, लेकिन फिलहाल विश्वविद्यालय परिसर को अराजकता और उपद्रव से मुक्त रखने के लिए यह जरूरी कदम उठाया गया है। छात्रों का कहना है कि वे प्रशासन के साथ बैठकर इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करने को तैयार हैं ताकि शोध-अध्ययन और शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

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