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बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ ने बेरहमी से हत्या, परिवार को 25 हजार रुपये का मुआवजा ‘अपमान’ जैसा लगा

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बांग्लादेश के मयमनसिंह जिले में 18 दिसंबर 2025 को एक भयावह घटना ने पूरे दक्षिण एशिया में हलचल मचा दी है, जब टिन की एक फैक्ट्री में काम करने वाले 27-वर्षीय हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को कथित ईशनिंदा के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला और उसके शव को पेड़ से लटकाकर आग लगा दी गई। हालांकि बाद में अधिकारियों की जांच में यह पुष्टि हुई कि उसके खिलाफ लगाए गए ईशनिंदा के आरोप के कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं, फिर भी भीड़ की हिंसा इतनी क्रूर थी कि उसकी मौत हो गई और पूरा मामला मीडिया के कैमरों में कैद हो गया।

घटना के बाद बांग्लादेश सरकार ने दीपू के परिवार को 25,000 रुपये नकद, कुछ चावल, एक कंबल और एक सिलाई मशीन के रूप में अनुग्रह राशि (compensation) दी, लेकिन परिवार ने इसे मदद न मानकर अपमान जैसा बताया। परिवार के सदस्यों ने कहा कि इतनी छोटी राशि से न तो उनकी जिंदगी सुधर सकती है और न ही दीपू की याद का बोझ हल्का हो सकता है। वे महसूस करते हैं कि सरकार की ओर से दी गई यह राशि मात्र एक औपचारिकता है और इससे उनकी वास्तविक जरूरतों की पूर्ति नहीं होती।

दीपू के पिता रविलाल दास ने मीडिया से बातचीत में बताया कि उनके बेटे के साथ जो कुछ हुआ वह पूरी तरह से अवैध और निर्दय था। उन्होंने कहा कि शुरुआत में उन्हें फेसबुक पर यह खबर मिली कि दीपू को बुरी तरह मारा गया है, और जब वे पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उसके सिर और शरीर को जलाया गया और शव को सड़क किनारे छोड़ दिया गया। रविलाल ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके बेटे को कोई धार्मिक टिप्पणी नहीं करनी थी, बल्कि उसके सहकर्मियों द्वारा फैली अफवाहों और नौकरी को लेकर जलन के कारण उन लोगों ने झूठे आरोप लगाकर भीड़ को उकसाया था।

दीपू का परिवार और गांव के लोग अब भय और दहशत के माहौल में जी रहे हैं। एनडीटीवी के संवाददाताओं के अनुसार गांव में लोगों ने बताया कि इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय के लिए हालात बहुत खराब हैं और वे डर के साये में जी रहे हैं। कई लोग यह महसूस कर रहे हैं कि उन्हें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और आकांक्षाओं पर लगाम लगानी पड़ेगी, अन्यथा जीवन जोखिम में पड़ सकता है।

यह जघन्य घटना बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते तनाव का प्रतीक बन चुकी है। भीड़ हिंसा की यह लिंचिंग उस वक्त हुई जब देश में राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा पहले से व्याप्त थी, खासकर युवाओं के नेता शरिफ उस्मान हादी की मौत के बाद। इस बीच, दोषियों के खिलाफ कुछ गिरफ्तारियाँ भी हुई हैं, लेकिन इसके बावजूद अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की जा रही है।

दूसरी ओर, इस घटना पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आक्रोश देखा गया है। भारत और अन्य देशों में विरोध प्रदर्शन हुए हैं जहाँ लोगों ने बांग्लादेश सरकार से न्याय और सुरक्षा की माँग की है। कई सामाजिक और राजनीतिक समूहों ने इस हिंसा की कड़ी निंदा की है और बांग्लादेश में धार्मिक सौहार्द बनाए रखने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।

दीपू की हत्या और उसके परिवार को दिए गए मामूली मुआवजे ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली को कैसे सुनिश्चित किया जाए, और इसका असर व्यापक सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर लंबे समय तक महसूस किया जाएगा। इस घटना ने न केवल बांग्लादेश के अंदरूनी मामलों पर सवाल उठाए हैं, बल्कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानवीय एवं मानवाधिकार चर्चा को भी नई दिशा दी है।

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