अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने के प्रावधान को फिलहाल रोककर भारत को बड़ी राहत दी है। इस फैसले से भारतीय निर्यातकों पर अमेरिका में भारी अतिरिक्त शुल्क लगने का तत्काल खतरा कम हो गया है। हालांकि, इसे भारत को स्थायी छूट मिलना नहीं माना जा सकता, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन भविष्य में इन प्रतिबंधों को फिर से लागू कर सकता है। ट्रंप ने यह कदम अमेरिकी राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए उठाया है
इस पूरे विवाद की जड़ रूस से भारत की तेल खरीद है। फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद रूस ने अपने कच्चे तेल पर छूट दी, जिसका फायदा भारतीय रिफाइनरी कंपनियों ने उठाया। इससे रूस भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, इसलिए कीमत, आपूर्ति और परिवहन लागत में बदलाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
अमेरिका ने रूस की ऊर्जा से होने वाली कमाई पर दबाव बनाने के लिए सितंबर 2026 में लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट पर हस्ताक्षर किए थे। इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले प्रमुख देशों के सामान पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान रखा गया था। भारत और चीन जैसे बड़े खरीदारों को इससे जोखिम था। अगर भारत के अमेरिका जाने वाले सामान पर इतना भारी अतिरिक्त शुल्क लगता, तो भारतीय उत्पादों की कीमत वहां बढ़ सकती थी और निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती थी।
टैरिफ का खतरा घटने के पीछे एक अहम कारण अमेरिकी प्रशासन का अपना आर्थिक हित भी माना जा रहा है। अमेरिका में ईंधन की कीमतों और आपूर्ति को लेकर दबाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने रूस से संबंधित कुछ प्रतिबंधों और शुल्कों को फिलहाल रोकने का फैसला किया। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और रूस के बीच डीजल आपूर्ति को लेकर भी समझौता हुआ है। ऐसे में रूस की ऊर्जा खरीद पर दूसरे देशों को दंडित करने और खुद रूसी ईंधन हासिल करने के बीच नीति को लेकर सवाल उठ सकते हैं। हालांकि, इन घटनाओं से यह निश्चित रूप से साबित नहीं होता कि डीजल समझौता ही टैरिफ रोकने का एकमात्र कारण था।
अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत को एक महत्वपूर्ण साझेदार बताया है। भारत की ऊर्जा जरूरतों और वैश्विक आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए रूस से तेल खरीद का मुद्दा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें रणनीतिक संबंधों और ऊर्जा सुरक्षा की भूमिका भी है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह एक ओर किफायती तेल की उपलब्धता बनाए रखे और दूसरी ओर अमेरिका जैसे बड़े निर्यात बाजार के साथ व्यापारिक संबंधों को भी संभाले।
इस फैसले से भारत को तत्काल राहत जरूर मिली है, लेकिन अमेरिकी नीति में बदलाव की गुंजाइश बनी हुई है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने भी चेताया है कि छूट को वापस लिया जा सकता है और इससे भारतीय कारोबारियों के लिए भविष्य की योजना बनाना मुश्किल हो सकता है। इसलिए भारत के लिए तेल की खरीद के स्रोतों में विविधता बनाए रखना और अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर स्पष्टता हासिल करना महत्वपूर्ण रहेगा।
भारत पहले से ही रूस के अलावा अफ्रीका, अमेरिका और दक्षिण अमेरिका जैसे क्षेत्रों से भी तेल खरीदने के विकल्पों पर काम कर रहा है। पश्चिम एशिया में आपूर्ति बाधित होने और समुद्री मार्गों पर जोखिम बढ़ने से वैकल्पिक स्रोतों की अहमियत और बढ़ गई है। रूस से तेल की उपलब्धता भारतीय रिफाइनरियों के लिए उपयोगी रही है, लेकिन किसी एक देश की नीति पर निर्भरता कम करने के लिए खरीद के स्रोतों में संतुलन जरूरी है।
कुल मिलाकर, ट्रंप के ताजा फैसले ने भारत पर संभावित 100 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ का तत्काल दबाव कम किया है, लेकिन व्यापारिक विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी प्रशासन छूट को कितने समय तक जारी रखता है और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता किस दिशा में आगे बढ़ती है। फिलहाल भारतीय निर्यातकों को राहत मिली है, जबकि ऊर्जा सुरक्षा और व्यापारिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखना भारत के लिए अहम बना हुआ है।
