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ट्रंप के सीजफायर फॉर्मूले पर दुनिया की नजर: अमेरिका-ईरान युद्ध रोकने को लेकर तेज हुई डील की कोशिशें

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मध्य पूर्व में जारी तनाव और अमेरिका-ईरान संघर्ष के बीच अब युद्धविराम को लेकर बड़ी कूटनीतिक हलचल शुरू हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि ईरान के साथ संघर्ष खत्म करने के लिए बातचीत तेजी से आगे बढ़ रही है और जल्द ही सीजफायर समझौते की दिशा में बड़ा फैसला लिया जा सकता है। हालांकि दूसरी ओर ईरान अभी भी अमेरिकी प्रस्तावों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं दिख रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच एक अस्थायी समझौते का मसौदा तैयार किया गया है।

इस प्रस्ताव में सबसे पहले सैन्य कार्रवाई रोकने, फिर होरमुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही सामान्य करने और उसके बाद 30 दिनों तक व्यापक शांति वार्ता चलाने का प्लान शामिल है। बताया जा रहा है कि इस पूरी बातचीत में पाकिस्तान अहम मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। सूत्रों के अनुसार यह संघर्ष तब और गंभीर हो गया था जब अमेरिका और इजरायल ने फरवरी में ईरान के कई सैन्य और परमाणु ठिकानों पर संयुक्त हमले किए थे।

इसके जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमले शुरू कर दिए। इसके बाद खाड़ी क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ता गया और दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल सप्लाई लाइन माने जाने वाले Strait of Hormuz पर संकट गहरा गया। इस बीच ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर भारी दबाव बनाने के लिए आर्थिक और सैन्य रणनीति अपनाई। अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों और तेल आपूर्ति पर कड़ी निगरानी शुरू की। हाल ही में अमेरिकी सेना ने एक ईरानी झंडे वाले ऑयल टैंकर पर कार्रवाई भी की थी, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा हुई।

हालांकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट ने ट्रंप प्रशासन के दावों पर सवाल भी खड़े किए हैं। एक गोपनीय CIA रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान अभी भी लंबे समय तक अमेरिकी दबाव झेलने की क्षमता रखता है। रिपोर्ट के अनुसार ईरान के पास अब भी बड़ी संख्या में मिसाइल और सैन्य संसाधन मौजूद हैं और उसका रक्षा तंत्र पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान दोनों ही इस समय सीधे बड़े युद्ध से बचना चाहते हैं।

लगातार बढ़ते सैन्य खर्च, तेल बाजार में अस्थिरता और वैश्विक दबाव के कारण दोनों देशों पर समझौते का दबाव बढ़ा है। खासतौर पर तेल कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। हाल के दिनों में शांति वार्ता की खबरों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी दर्ज की गई। रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि अमेरिका की कुछ सैन्य योजनाओं को उसके सहयोगी देशों से पूरा समर्थन नहीं मिला।

बताया जा रहा है कि सऊदी अरब ने अमेरिकी सैन्य अभियानों के लिए अपने कुछ एयरबेस और हवाई क्षेत्र के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई, जिसके बाद अमेरिका को अपनी “Project Freedom” रणनीति रोकनी पड़ी। उधर ईरान ने भी साफ किया है कि वह बिना अपनी शर्तों के किसी समझौते को स्वीकार नहीं करेगा। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि तेहरान अभी अमेरिकी प्रस्तावों की समीक्षा कर रहा है और जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लिया जाएगा।

ईरान का कहना है कि केवल युद्धविराम नहीं बल्कि प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी स्पष्ट समाधान जरूरी है। मध्य पूर्व में जारी इस संघर्ष का असर पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है। कई देशों ने अपने नागरिकों के लिए एडवाइजरी जारी की है, जबकि एयरलाइंस और शिपिंग कंपनियां भी लगातार हालात पर नजर बनाए हुए हैं। यूरोप, चीन और संयुक्त राष्ट्र समेत कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने दोनों देशों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह समझौता सफल होता है तो यह केवल अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम नहीं होगा, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में तनाव कम करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है। लेकिन यदि बातचीत विफल होती है तो क्षेत्र में एक और बड़े संघर्ष का खतरा बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।

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