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रूसी तेल खरीद पर अमेरिका का बदला सुर

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भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर अमेरिका का रुख अब पहले की तुलना में नरम होता दिखाई दे रहा है। अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अमेरिका भारत द्वारा लगातार खरीदे जा रहे रूसी तेल को वैश्विक तेल बाजार को स्थिर बनाए रखने की प्रक्रिया का हिस्सा मानता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित रखने और दुनिया भर के उपभोक्ताओं को राहत देने में भारत एक “महत्वपूर्ण साझेदार” की भूमिका निभा रहा है। अमेरिकी दूतावास के इस बयान को ऐसे समय में अहम माना जा रहा है जब मध्य-पूर्व में तनाव और समुद्री मार्गों में व्यवधान के कारण अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।

सर्जियो गोर ने अपने बयान में कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं और रिफाइनिंग केंद्रों में से एक है, इसलिए उसकी ऊर्जा नीतियों का असर सीधे वैश्विक बाजार पर पड़ता है। उनके मुताबिक रूस से भारत की खरीद ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति को बनाए रखने में मदद की है, जिससे कीमतों में अनियंत्रित उछाल को रोकने में सहायता मिली है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका और भारत को ऊर्जा बाजार की स्थिरता के लिए मिलकर काम करना चाहिए ताकि दोनों देशों के नागरिकों को लाभ मिल सके।

दरअसल पिछले कुछ वर्षों से रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूसी तेल पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना जारी रखा। इसी कारण अमेरिका और कुछ पश्चिमी देशों ने पहले भारत की आलोचना भी की थी और कुछ मामलों में शुल्क तथा प्रतिबंधों की चेतावनी दी थी। बाद में वैश्विक तेल बाजार में बढ़ती अस्थिरता और आपूर्ति संकट को देखते हुए अमेरिका ने अपने रुख में कुछ लचीलापन दिखाया।

मध्य-पूर्व में हालिया तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास पैदा हुए संकट ने भी ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बड़े आयातक देशों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती तो वैश्विक कीमतें तेजी से बढ़ सकती थीं। इसी पृष्ठभूमि में अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के मामले में व्यावहारिक रुख अपनाया और इसे बाजार को स्थिर रखने के प्रयास के रूप में देखा।

इस घटनाक्रम को भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच व्यापार, रक्षा और रणनीतिक सहयोग लगातार बढ़ा है, लेकिन रूस से ऊर्जा खरीद को लेकर कई बार मतभेद सामने आए। अब अमेरिकी राजदूत का बयान संकेत देता है कि वॉशिंगटन भारत की ऊर्जा जरूरतों और उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखने लगा है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की नीति साफ है—देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न स्रोतों से तेल खरीदता रहेगा। अगर वैश्विक बाजार में आपूर्ति संतुलित रहती है तो इसका लाभ न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को मिलेगा। ऐसे में अमेरिका का यह नया बयान अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा राजनीति में एक अहम संकेत माना जा रहा है।

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