
यूजीसी के 2026 इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई, विरोध-प्रदर्शन एवं विवाद गहराया
भारत में उच्च शिक्षा को लेकर University Grants Commission (UGC) द्वारा जनवरी 2026 में जारी किए गए नए इक्विटी नियम (Equity Regulations 2026) ने शिक्षण जगत, छात्र समुदाय और न्यायपालिका तक में व्यापक विवाद पैदा कर दिया है। इन नियमों का उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में जाति-आधारित भेदभाव को रोकना और समावेशी माहौल स्थापित करना था, लेकिन जैसे ही उन्हें लागू किया गया, वैसे ही इससे जुड़ी धारणाओं और उनके प्रभाव को लेकर तीव्र विरोध शुरू हो गया। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को इन नए नियमों पर निग्रह आदेश (stay order) जारी कर दिया और आगे की सुनवाई के लिए 19 मार्च 2026 तक रोक लगा दी है।
नए UGC नियमों के तहत उच्च शिक्षा संस्थानों को उन मामलों के निपटारे और शिकायतों के समाधान के लिए ‘Equity Committees’ या समान अवसर केंद्र स्थापित करना अनिवार्य किया गया था। इन समितियों का लक्ष्य जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता आदि आधार पर किसी भी भेदभाव की शिकायतों को कारगर तरीके से हल करना था। हालांकि विरोधी समूहों का आरोप है कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और इससे सामान्य वर्ग (General category) के छात्रों के अधिकारों के साथ भेदभाव का खतरा उत्पन्न हो सकता है। विरोधियों ने कहा कि नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए शिकायत दर्ज कराने की स्पष्ट व्यवस्था नहीं है और यह अनुच्छेद संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के खिलाफ है।
इन नियमों के खिलाफ देशभर में छात्र प्रदर्शन और विरोधसभा का आलम यह रहा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस, पिलिभीत, उज्जैन और पटना जैसे कई शहरों में छात्रों और समर्थकों ने जमकर आवाज उठाई। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि नए कानून में परिभाषाओं की भ्रामक और व्यापक व्याख्या हो सकती है, जिससे सवर्ण छात्रों को अनुपातिक अवसर नहीं मिलेगा और शिकायत प्रणाली का दुरुपयोग हो सकता है। कुछ प्रदर्शनकारियों ने ‘Equity for all, not for few’ जैसे नारे भी लगाए।
विरोध केवल छात्रों तक सीमित नहीं रहा — कई राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तियों ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रियाएँ दी हैं। कुछ नेताओं ने कहा कि यह विरोध “जातिगत मानसिकता” से प्रेरित है, जबकि अन्य ने कहा कि यह नियम शिक्षा के क्षेत्र में असमानता को खत्म करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं, लेकिन उन्हें व्यापक परामर्श और समीक्षा की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि नई नियमावली में प्रयुक्त भाषा अस्पष्ट (vague) और दुरुपयोग के लिए सक्षम (capable of misuse) प्रतीत होती है और इससे सामाजिक विभाजन की संभावना हो सकती है। इस कारण न्यायालय ने इन नियमों को मूर्त रूप देने से पहले विशेषज्ञों की समिति द्वारा उनकी समीक्षा करने का सुझाव दिया है और अदालत ने यह भी निर्देश दिया है कि 2012 के पुराने नियम तब तक लागू रहेंगे जब तक नए नियमों पर अंतिम निर्णय नहीं होता।
नए नियमों को लेकर विरोध और न्यायालय की रोक ने उच्च शिक्षा नीति और जातिगत न्याय के बीच संतुलन बनाये रखने के मुद्दे को फिर से राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया है। समर्थन और विरोध दोनों तरफ के तर्क यह दर्शाते हैं कि शिक्षा प्रणाली में समानता और निष्पक्षता बनाए रखने की चुनौतियों को संबोधित करने के लिए बेहतर, स्पष्ट और व्यापक संवाद की आवश्यकता है।



