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जन्म से नहीं थी एक आंख, हादसे ने दूसरी ले ली! मेहनत कर बने बैंक में डिप्टी मैनेजर, फिर इस जर्मन खेल के महारथी

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कहते हैं अगर हौसले बुलंद हों तो हालात चाहे जैसे भी हों, इंसान अपनी मंज़िल पा ही लेता है। बिहार के सोनू सिंह की कहानी इस बात की सबसे बड़ी मिसाल है। जन्म से ही उनकी एक आंख काम नहीं करती थी और बाद में एक हादसे में उन्होंने दूसरी आंख की रोशनी भी खो दी। पूरी तरह दृष्टिहीन होने के बावजूद सोनू ने न सिर्फ पढ़ाई और नौकरी में सफलता हासिल की, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय खेल में भी अपनी पहचान बनाई।

बचपन से संघर्ष, लेकिन हिम्मत नहीं हारी

सोनू सिंह का जन्म बिहार में हुआ। बचपन से ही आंखों की कमजोरी उनके जीवन का हिस्सा रही, लेकिन परिवार और शिक्षकों के सहयोग से उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। जीवन उस वक्त और कठिन हो गया जब एक दुर्घटना में उनकी दूसरी आंख की रोशनी भी चली गई। यह किसी के लिए भी टूट जाने का पल हो सकता था, लेकिन सोनू ने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।

मेहनत से बनाई करियर की राह

दृष्टिहीन होने के बाद भी सोनू ने पढ़ाई नहीं छोड़ी। कड़ी मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की और पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में चयनित होकर नोएडा में डिप्टी मैनेजर के पद तक पहुंचे। बैंकिंग जैसी जिम्मेदार नौकरी में उनका चयन यह साबित करता है कि शारीरिक अक्षमता कभी काबिलियत के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती।

जर्मनी के खेल ‘गोलबॉल’ में बनाई पहचान

नौकरी के साथ-साथ सोनू सिंह ने खेलों में भी खुद को साबित किया। उन्होंने गोलबॉल (Goalball) को चुना, जो जर्मनी से शुरू हुआ एक विशेष खेल है और खास तौर पर दृष्टिहीन खिलाड़ियों के लिए खेला जाता है। इस खेल में सुनने की क्षमता, फुर्ती और टीमवर्क सबसे अहम होता है।

सोनू ने कड़ी ट्रेनिंग के बाद गोलबॉल में शानदार प्रदर्शन किया और बिहार टीम के कप्तान बने। उनके नेतृत्व में टीम ने कई प्रतियोगिताओं में बेहतरीन खेल दिखाया। आज सोनू न सिर्फ एक सफल बैंक अधिकारी हैं, बल्कि सैकड़ों दिव्यांग युवाओं के लिए प्रेरणा भी हैं।

युवाओं के लिए संदेश

सोनू सिंह कहते हैं कि “हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर आप खुद पर भरोसा रखें और लगातार मेहनत करें, तो सफलता जरूर मिलती है।” उनकी कहानी यह सिखाती है कि असली रोशनी आंखों में नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और हौसले में होती है।

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