पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल युद्ध से पैदा हुए तनाव और उसके वैश्विक असर को देखते हुए केंद्र सरकार ने संसद परिसर में एक अहम सर्वदलीय बैठक बुलाई, जिसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। इस बैठक का उद्देश्य भारत पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव—खासतौर पर ऊर्जा, सुरक्षा और विदेश नीति—पर चर्चा करना और सभी दलों से सुझाव लेना था।
हालांकि इस महत्वपूर्ण बैठक से पहले ही सियासी मतभेद सामने आ गए। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने बैठक का बहिष्कार कर दिया। पार्टी के वरिष्ठ नेता सौगत रॉय ने साफ कहा कि उनकी राजनीतिक लड़ाई बीजेपी से है, ऐसे में वे इस बैठक में शामिल नहीं होंगे।
वहीं, लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी भी इस बैठक में शामिल नहीं हुए। उन्होंने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि केरल में तय कार्यक्रम के चलते वे बैठक में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। हालांकि, बैठक से पहले उन्होंने केंद्र सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए इसे “संरचनात्मक गलती” बताया और कहा कि सरकार अंतरराष्ट्रीय हालात को सही तरीके से संभाल नहीं रही है।
इस सर्वदलीय बैठक में कई प्रमुख नेता और मंत्री शामिल हुए, जिनमें गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस जयशंकर, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी समेत विभिन्न दलों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। बैठक में खास तौर पर मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के भारत की तेल-गैस सप्लाई, व्यापारिक मार्गों और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की गई।
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा था कि सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए सात सशक्त समूह बनाए हैं, जो एलपीजी, ईंधन आपूर्ति, और अन्य आवश्यक सेवाओं पर लगातार नजर रखेंगे। उन्होंने देशवासियों को भरोसा दिलाया कि भारत में तेल और गैस की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी और सरकार स्थिति पर पूरी तरह नियंत्रण बनाए हुए है।
कुल मिलाकर, यह बैठक ऐसे समय में हो रही है जब मिडिल ईस्ट का संघर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत जैसे देशों की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर रहा है। लेकिन विपक्ष के कुछ दलों की गैरमौजूदगी और बहिष्कार ने इस बैठक की राजनीतिक अहमियत को और बढ़ा दिया है। अब देखना होगा कि इस बैठक के बाद सरकार क्या रणनीति अपनाती है और क्या सभी दल किसी साझा रुख पर पहुंच पाते हैं।
