नई दिल्ली। मध्य पूर्व में बढ़ते ईरान-अमेरिका तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल के कारण देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल (CRISIL) की ताजा रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि वैश्विक हालात जल्द नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे आम जनता पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ सप्ताहों में पेट्रोल और डीजल के दामों में चार चरणों में लगातार बढ़ोतरी की जा चुकी है। 15 मई को पहली बार तीन रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई। इसके बाद 19 मई, 23 मई और 25 मई को भी कीमतों में क्रमिक बढ़ोतरी की गई। कुल मिलाकर पेट्रोल और डीजल करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर तक महंगे हो चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी अभी अंतिम नहीं है। क्रिसिल की रिपोर्ट के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो तेल कंपनियां अपने घाटे की भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग 2.5 रुपये प्रति लीटर तक और वृद्धि कर सकती हैं। इस स्थिति में कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है।
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बने तनाव ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी कारण ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुकी हैं।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में किसी भी बढ़ोतरी का सीधा असर घरेलू ईंधन कीमतों पर पड़ता है। हाल के महीनों में सरकारी तेल कंपनियों ने भी बढ़ती लागत और घाटे का हवाला देते हुए ईंधन दरों में वृद्धि की है।
क्रिसिल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ट्रांसपोर्ट, लॉजिस्टिक्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, दैनिक उपयोग की वस्तुओं और अन्य उपभोक्ता उत्पादों के दाम भी बढ़ सकते हैं। इससे खुदरा महंगाई दर पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रक, बस और माल परिवहन सेवाएं मुख्य रूप से डीजल पर निर्भर हैं। जब डीजल महंगा होता है तो परिवहन लागत बढ़ जाती है, जिसका असर फल-सब्जियों से लेकर निर्माण सामग्री और उपभोक्ता वस्तुओं तक सभी उत्पादों की कीमतों पर पड़ता है। यही कारण है कि ईंधन की कीमतों को अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
उद्योग जगत भी इस बढ़ती लागत को लेकर चिंतित है। विनिर्माण क्षेत्र में उत्पादन लागत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर दबाव बन सकता है। कई कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकती हैं, जिससे बाजार में महंगाई और बढ़ सकती है।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान-अमेरिका तनाव लंबा खिंचता है और वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित रहती है तो भारत को ईंधन कीमतों के साथ-साथ महंगाई और आर्थिक विकास की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ सकता है। सरकार और तेल कंपनियां फिलहाल स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन आम उपभोक्ताओं को आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के लिए और अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।
फिलहाल देशभर के उपभोक्ताओं की निगाहें अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर टिकी हुई हैं, क्योंकि वहीं से तय होगा कि आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रहेंगी या फिर महंगाई का एक नया दौर शुरू होगा।
