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जामिया मिलिया इस्लामिया में प्रोफेसर विवाद: मजदूर पर हमला, जाति-धर्म के नाम पर गालियाँ और धार्मिक दबाव के आरोप से सुर्खियों में मामला

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नई दिल्ली: देश की प्रतिष्ठित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय एक बार फिर विवादों में घिर गई है, जब एक अनुसूचित जनजाति (ST) कर्मचारी ने विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोपों में शारीरिक हमला, जातिगत गालियाँ, धार्मिक पहचान को भेदभाव बनाना और कथित रूप से धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालना शामिल है। मामला अब एफआईआर दर्ज होने और पुलिस जांच के साथ संवेदनशील रूप ले रहा है।

पॉलिटेक्निक विभाग में अपर डिवीजन क्लर्क के पद पर कार्यरत राम फूल मीणा ने आरोप लगाया है कि सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रियाजुद्दीन ने उनके साथ हिंसक व्यवहार और दुर्व्यवहार किया। मीणा ने शिकायत में कहा कि उन्हें जातिसूचक गालियाँ दी गईं, “जंगली” और “काफिर” जैसे अपमानजनक शब्द कहे गए, और उनके चेहरे पर मुक्के भी मारे गए, जिससे उनके होंठ फट गए और आँख के नीचे सूजन आ गई। इस घटना के बाद उन्हें विश्वविद्यालय के स्वास्थ्य केंद्र में इलाज कराना पड़ा।

मीणा के मुताबिक घटना तब शुरू हुई जब उन्होंने पहले ही एक अन्य शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उस प्रोफेसर पर छात्र के साथ दुर्व्यवहार का आरोप था। उन्होंने आरोप लगाया कि शिकायत के बाद प्रोफेसर ने उनपर व्यक्तिगत हमला शुरू कर दिया और उन्हें जाति, धर्म और पहचान के आधार पर तिरस्कृत किया। मीणा ने यह भी दावा किया कि उन्हें लगातार धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला गया, और उन्हें अपनी पहचान बदलने को कहा जाता रहा, जिसे उन्होंने अत्यंत अपमानजनक बताया।

यह मामला और गंभीर तब हो गया जब एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें आरोपी प्रोफेसर को क्लासरूम में एक छात्र को लात मारते देखा जा सकता है। विडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया है और इस पर लोगों ने सवाल उठाए हैं कि किस तरह यह शैक्षणिक संस्थान के शिक्षण और अनुशासन के मानदंडों के अनुरूप है।

राम फूल मीणा ने यह भी आरोप लगाया कि जब उन्होंने रजिस्ट्रार कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज कराई, तो प्रशासन ने उन्हें ही उसी दिन तबादला कर दिया, जबकि आरोपित प्रोफेसर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने इसे इसे दमनात्मक और सच को दबाने का प्रयास बताया है।

बातचीत के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है, लेकिन पुलिस का एक बयान भी सामने आया है जिसमें कहा गया है कि शिकायत में धार्मिक परिवर्तन (conversion) का कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं लगाया गया है, और सोशल मीडिया पर फैल रही धार्मिक रूपांतरण की रिपोर्टें “अप्रमाणिक और बेसबुन हैं। पुलिस ने कहा कि जांच के दौरान ही सभी तथ्य सामने आएँगे और अनुरोध किया है कि बिना पुष्टि वाले दावों को न फैलाया जाए।

उधर, विश्वविद्यालय के प्रशासन की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, और न ही आरोपी प्रोफेसर की ओर से कोई बयान जारी हुआ है। तनावपूर्ण स्थितियाँ और आरोपों को लेकर जामिया परिसर में अलग-अलग समूहों के बीच नाराज़गी बढ़ती जा रही है।

यह विवाद उस समय उठा है जब देश में शैक्षणिक संस्थानों में समावेशन, भेदभाव और धार्मिक-जातिगत पहचान पर आधारित भेदभाव के मुद्दों पर पहले से भी बहस चल रही है। इस तरह के आरोप विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक माहौल और सामाजिक समावेशन के सिद्धांतों के खिलाफ गंभीर चिंताएँ पैदा करते हैं, जिससे न केवल जामिया बल्कि अन्य शिक्षण संस्थानों में भी विश्वास और सुरक्षा पर सवाल उठ सकते हैं।

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