मध्य पूर्व में जारी ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष का असर अब यूरोप तक साफ दिखाई देने लगा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री Keir Starmer ने इस संकट को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि यह युद्ध केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करने वाला है। उन्होंने साफ तौर पर चेतावनी दी कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे और हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को नहीं खोला गया, तो इसका असर ब्रिटेन समेत कई देशों के भविष्य पर पड़ेगा।
स्टारमर ने लंदन में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि यह संघर्ष “हमारा युद्ध नहीं है” और ब्रिटेन इसमें सीधे शामिल नहीं होगा, लेकिन इसके आर्थिक परिणामों से देश बच नहीं सकता। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी, महंगाई और आम लोगों की जिंदगी पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। दरअसल, हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20% गुजरता है, और इसके बंद होने से पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट गहरा गया है।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने यह भी ऐलान किया कि यूके इस संकट को हल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहल करेगा। विदेश मंत्री Yvette Cooper की अगुवाई में कई देशों की बैठक बुलाई जाएगी, जिसमें हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने पर चर्चा होगी। इस बैठक में कूटनीतिक और रणनीतिक उपायों पर विचार किया जाएगा, ताकि फंसे हुए जहाजों और व्यापारिक गतिविधियों को फिर से शुरू किया जा सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ा है। जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है और तेल की कीमतों में रिकॉर्ड उछाल देखा गया है। इससे न केवल यूरोप बल्कि एशिया और अन्य देशों की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ गया है।
स्टारमर ने यह भी कहा कि इस संकट से निपटने का सबसे अच्छा तरीका तनाव कम करना (de-escalation) और बातचीत के जरिए समाधान निकालना है। उन्होंने संकेत दिया कि अगर जल्द ही कोई समाधान नहीं निकला, तो ब्रिटेन में महंगाई और ऊर्जा संकट और गहरा सकता है, जिससे आम लोगों की जेब पर भारी असर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, ब्रिटेन का यह रुख साफ करता है कि वह सीधे युद्ध में शामिल होने के बजाय कूटनीतिक रास्ते से समाधान चाहता है। लेकिन हॉर्मुज जलडमरूमध्य का संकट और बढ़ता तनाव यह दिखाता है कि यह संघर्ष अब केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए आर्थिक और ऊर्जा चुनौती बन चुका है।
