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संसद से सड़क तक गरमाई राजनीति, CJP प्रदर्शन को लेकर राहुल गांधी और अखिलेश यादव सरकार पर हमलावर

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संसद के मानसून सत्र के दौरान देश की राजनीति उस समय और अधिक गरमा गई जब दिल्ली में चल रहे CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के आंदोलन और छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर विपक्ष ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। संसद के भीतर जहां विपक्ष ने शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा अनियमितताओं और प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया, वहीं संसद के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई विपक्षी नेताओं ने सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। विपक्ष का आरोप है कि छात्रों और युवाओं की आवाज सुनने के बजाय सरकार विरोध प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश कर रही है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी CJP आंदोलन लगातार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। संगठन के प्रमुख अभिजीत दिपके ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जब तक शिक्षा व्यवस्था में सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे जैसी प्रमुख मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र, युवा और विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं, जो इसे केवल परीक्षा विवाद नहीं बल्कि युवाओं के भविष्य से जुड़ा व्यापक आंदोलन बता रहे हैं।

मानसून सत्र के पहले ही दिन विपक्ष ने इस मुद्दे को संसद में प्रमुखता से उठाया। राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया कि युवाओं की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा और लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार का सम्मान नहीं किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी छात्रों के पक्ष में आवाज उठाते हुए कहा कि सरकार को दमन की बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहिए। विपक्षी दलों का कहना है कि परीक्षा प्रणाली में बार-बार सामने आ रही अनियमितताओं ने लाखों छात्रों का भरोसा कमजोर किया है और इस पर जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

इसी बीच राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास की ओर मार्च और धरना देकर आंदोलन के प्रति अपना समर्थन भी जताया। पुलिस ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें और अन्य नेताओं को आगे बढ़ने से रोका, जिसके बाद कुछ समय के लिए हिरासत में भी लिया गया। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक गर्म हो गया। कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन बताया, जबकि सरकार और भाजपा नेताओं ने विपक्ष पर आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया।

वहीं, आंदोलन के नेतृत्व कर रहे अभिजीत दिपके ने कहा कि CJP किसी राजनीतिक दल का मंच नहीं है और उसका उद्देश्य केवल छात्रों तथा युवाओं की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाना है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों के समर्थन का स्वागत तो किया, लेकिन यह भी दोहराया कि आंदोलन की दिशा और निर्णय आंदोलनकारी स्वयं तय करेंगे। दिपके ने अपील की कि छात्रों के मुद्दों को राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर रखकर देखा जाना चाहिए।

संसद के भीतर भी इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। सरकार की ओर से कहा गया कि शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए वह तैयार है और आवश्यक सुधारों पर काम किया जा रहा है। साथ ही यह भी कहा गया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है और किसी भी प्रदर्शन को हिंसक या अराजक नहीं होने दिया जा सकता। विपक्ष ने इस जवाब को अपर्याप्त बताते हुए सरकार से ठोस कदम उठाने और छात्रों की मांगों पर स्पष्ट निर्णय लेने की मांग की।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि युवाओं और शिक्षा से जुड़े मुद्दों ने अब राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है। ऐसे में संसद के मानसून सत्र के दौरान यह विषय लगातार चर्चा का केंद्र बना रह सकता है। यदि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच जल्द किसी सहमति का रास्ता नहीं निकलता, तो विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक टकराव दोनों के और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।

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