‘वंदे मातरम’ को लेकर देश में चल रही बहस अब बॉलीवुड तक पहुंच गई है। दिग्गज अभिनेता मुकेश खन्ना ने अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के उस रुख पर सवाल उठाया है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर गीत के शुरुआती 2 अंतरों को ही व्यापक रूप से स्वीकार किए जाने की बात कही थी। मुकेश खन्ना ने इस मुद्दे पर शर्मिला टैगोर की व्यक्तिगत जिंदगी और उनकी शादी के बाद बदले नाम का जिक्र करते हुए तीखी टिप्पणी की। उनके बयान के बाद यह विवाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गया है।
दरअसल, ‘वंदे मातरम’ की पूरी रचना में बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ आते हैं। इसी वजह से शर्मिला टैगोर ने कथित तौर पर कहा था कि भारत जैसे धार्मिक रूप से विविध देश में उन लोगों की भावनाओं को भी ध्यान में रखना चाहिए, जो एकेश्वरवादी धर्म को मानते हैं। उनका मानना बताया गया कि गीत के शुरुआती 2 अंतरों में मुख्य रूप से मातृभूमि के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना है, इसलिए इन्हें अधिक व्यापक रूप से स्वीकार किया जा सकता है।
शर्मिला टैगोर के इस रुख पर प्रतिक्रिया देते हुए मुकेश खन्ना ने कहा कि वह उनकी राय का सम्मान करते हैं, लेकिन यह समझ नहीं पा रहे कि धार्मिक आधार पर ‘वंदे मातरम’ को लेकर ऐसी आपत्ति क्यों होनी चाहिए। उन्होंने इस बहस को शर्मिला टैगोर की व्यक्तिगत पृष्ठभूमि से जोड़ते हुए उनके विवाह का उल्लेख किया और कहा कि शादी के समय उन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया था और ‘आयशा बेगम’ नाम अपनाया था। इसी संदर्भ में खन्ना ने उनसे सवाल किया कि क्या उन्हें शादी के बाद ही दूसरे धर्म के अस्तित्व और उसकी मान्यताओं का एहसास हुआ।
मुकेश खन्ना की टिप्पणी यहीं नहीं रुकी। उन्होंने शर्मिला टैगोर के बंगाली पारिवारिक और सांस्कृतिक माहौल का भी उल्लेख किया। उनका तर्क था कि शर्मिला टैगोर बंगाल में पली-बढ़ीं, जहां काली पूजा जैसी धार्मिक परंपराएं बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में खन्ना ने सवाल उठाया कि आज उन्हें क्यों लगता है कि दूसरे धर्मों के लोगों के लिए ‘वंदे मातरम’ के कुछ हिस्से स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है।
इस पूरे विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि ‘वंदे मातरम’ सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ा राष्ट्रीय प्रतीक है। हालांकि गीत के बाद के हिस्सों में देवी के संदर्भ होने के कारण इसके पूरे संस्करण को लेकर ऐतिहासिक समय से ही चर्चा और मतभेद रहे हैं। इसी वजह से इसके शुरुआती 2 अंतरों और पूरी रचना के बीच स्वीकार्यता को लेकर बहस समय-समय पर सामने आती रही है।
मुकेश खन्ना ने अपनी बात रखते हुए ए. आर. रहमान के प्रसिद्ध देशभक्ति गीत ‘मां तुझे सलाम’ का भी उदाहरण दिया। उनका तर्क था कि देश को ‘मां’ के रूप में संबोधित करने और उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने की भावना भारतीय राष्ट्रवाद में पहले से मौजूद है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को किसी खास तरीके से झुकने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन ‘वंदे मातरम’ का पूरी तरह विरोध करना उन्हें उचित नहीं लगता।
खन्ना ने इस विवाद को राजनीति से भी जोड़ दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘वंदे मातरम’ को लेकर राजनीतिक दल अपने-अपने फायदे के लिए तुष्टीकरण की राजनीति कर रहे हैं। उनके मुताबिक, कुछ राजनीतिक दल मुस्लिम मतदाताओं को साधने के लिए इस मुद्दे को चुनावी नजरिए से देख रहे हैं। हालांकि यह उनका राजनीतिक आकलन है और इसे तथ्य के रूप में नहीं बल्कि उनके बयान के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
वहीं, शर्मिला टैगोर का कथित रुख मुख्य रूप से धार्मिक विविधता और अलग-अलग आस्थाओं के सम्मान से जुड़ा बताया गया है। उनका तर्क यह है कि भारत में अलग-अलग धार्मिक समुदाय रहते हैं और राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े किसी भी विषय में सभी समुदायों की भावनाओं को ध्यान में रखना जरूरी है। इसीलिए वह शुरुआती 2 अंतरों को ज्यादा व्यापक रूप से स्वीकार्य मानती हैं।
इस विवाद में अब व्यक्तिगत टिप्पणियों के कारण बहस और ज्यादा तीखी हो गई है। ‘वंदे मातरम’ जैसे राष्ट्रीय महत्व के गीत पर विचार रखना एक अलग विषय है, लेकिन किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी, शादी या धार्मिक पहचान को उस राय के जवाब में सामने लाने से बहस का स्वर काफी व्यक्तिगत हो गया है। सोशल मीडिया पर भी लोग दोनों पक्षों के बयानों को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
मुकेश खन्ना ने हालांकि अपने बयान में यह भी स्पष्ट करने की कोशिश की कि वह किसी पर जबरदस्ती ‘वंदे मातरम’ थोपने की बात नहीं कर रहे हैं। उनका जोर इस बात पर है कि राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान होना चाहिए और धार्मिक आधार पर इसके गायन को पूरी तरह खारिज नहीं किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, इस विषय पर असहमति रखने वाले लोगों का तर्क धार्मिक स्वतंत्रता और विविधता से जुड़ा है।
फिलहाल ‘वंदे मातरम’ को लेकर शुरू हुई बहस में मुकेश खन्ना की शर्मिला टैगोर पर की गई टिप्पणी ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक तरफ राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमिका पर चर्चा हो रही है, तो दूसरी तरफ इसके धार्मिक संदर्भों और अलग-अलग समुदायों की भावनाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा मनोरंजन जगत से निकलकर राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा भी बन सकता है।
