
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक “नक्सल फ्री भारत” बनाने के लक्ष्य के तहत सुरक्षा बलों द्वारा देश भर में छेड़े गए नक्सल विरोधी अभियान को अब तक मिलीं सफलताओं का एक बड़ा आंकड़ा सामने आया है। पिछले लगभग 5 महीनों में कई कुख्यात नक्सल नेता या तो एनकाउंटर में मारे गए हैं या सुरक्षा बलों के दबाव के कारण संगठन से अलग हुए हैं, जिससे लाल आतंक की जड़ें गंभीर रूप से कमजोर हुई हैं।
सबसे ताज़ा और बड़ी सफलता झारखंड के सरांडा जंगल में हुई मुठभेड़ में देखने को मिली, जहां सुरक्षाबलों ने एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सली पतराम मांझी उर्फ़ ‘अनल दा’ समेत 15 माओवादी को मार गिराया। यह कार्रवाई कोल्हान क्षेत्र में नक्सलियों के लिए लंबे समय से मजबूत गढ़ माने जाने वाले इलाके में बड़ी क़ामयाबी मानी जा रही है, जिससे वहाँ का नक्सली नेटवर्क बुरी तरह टूटने लगा है।
ओडिशा में गणेश उइके का सफाया
ओडिशा के कंधमाल में सुरक्षा बलों की संयुक्त कार्रवाई में कुख्यात माओवादी नेता गणेश उइके और उसके साथियों को ढेर कर दिया गया। उइके पर केंद्र और राज्य सरकारों ने लाखों रुपये का इनाम घोषित किया हुआ था और वह संगठन के प्रशासनिक कर्ज़ के रूप में लंबे समय तक सक्रिय था। इस सफलता का सुरक्षा सूत्रों ने “नक्सलवाद के विरुद्ध बड़ा प्रहार” बताया है, जिससे पूर्वी भारत में माओवादी प्रभाव को गंभीर झटका लगा है।
माडवी हिडमा का प्रभाव और अंत
माओवादी संगठन की बस्तर इकाई का नामी गिरामी चेहरा रहे माडवी हिडमा, जिनके सिर पर भी उच्च इनामी राशि थी, को भी सुरक्षा बलों ने पिछले महीनों में एनकाउंटर में मार गिराया था। हिडमा को गुरिल्ला युद्ध का मास्टरमाइंड और पीपुल्स लिबरेशन गर्लिला आर्मी (PLGA) का प्रमुख नेतृत्वकर्ता माना जाता था। उसकी मौत को माओवादी कमान के लिए एक बड़ा नुकसान बताया गया है, क्योंकि वह स्थानीय आदिवासी युवाओं में काफ़ी प्रभाव रखता था।
इन बड़ी कार्रवाईयों के अलावा कई अन्य नक्सलियों ने भी सरेंडर कर दिया है और सुरक्षा बलों ने अन्य छोटी-छोटी मुठभेड़ों में भी हथियार तथा सामग्री ज़ब्त की है। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद में दोनों ने सुरक्षा अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण किया, जिससे स्थानीय क्षेत्र में नक्सलियों के मुकाबले जनता के बीच बढ़ती असुरक्षा और संदेह को भी खत्म करने में मदद मिली है।
सरकारी लक्ष्य : नक्सल मुक्त भारत
सरकार के मुताबिक “नक्सल मुक्त भारत” के लक्ष्य की दिशा में इन सफलताओं ने आंदोलन की कमर तोड़ दी है। प्रभावित जिलों की संख्या पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी घट चुकी है, और सुरक्षा बलों की निरंतर कार्रवाई से नक्सलियों का इलाक़ाई प्रभुत्व सीमित होता जा रहा है।
विश्लेषकों के मुताबिक यह दशक के सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक माना जाएगा, यदि सरकार मार्च 2026 तक वामपंथी उग्रवाद समाप्त करने का लक्ष्य हासिल कर लेती है, तो यह न केवल सुरक्षा बलों की रणनीति की सफलता होगी, बल्कि उन नागरिकों के लिए भी राहत की बात है जो कई दशकों से नक्सल प्रभावित इलाकों में जीवन-यापन को जोखिम भरा मानते आए हैं।



