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20 साल बाद नीतीश ने गृह विभाग छोड़ा — सम्राट चौधरी बने बिहार के नए होम मिनिस्टर, सत्ता में बड़ा पावर शिफ्ट

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बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 20 सालों बाद गृह मंत्रालय का जिम्मा अपने हाथों से छोड़कर डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को सौंप दिया है। यह आगरा का राजनीतिक फैसला सिर्फ विभागों का पुनर्वितरण नहीं, बल्कि एक नए सत्ता संतुलन का संकेत माना जा रहा है।

सम्राट चौधरी, जिन्होंने पहले भी राज्य सरकार में महत्वपूर्ण पद संभाले हैं, अब गृह विभाग की कमान अपने हाथ में लेकर सरकार के शक्तिशाली चेहरों में और अधिक ऊपर उठ गए हैं। गृह मंत्रालय राज्य में कानून-व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और सुरक्षा से जुड़े मामलों की मुख्य कड़ी है, इसलिए इसे मिलने वाला यह अधिकार उनकी सियासी पकड़ को और मजबूत करता है।

मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान कुल 18 मंत्रियों को पहले बंटवारा किया गया है, जिसमें सम्राट चौधरी के अलावा अन्य नेताओं को भी प्रमुख विभाग मिले हैं। उदाहरण के तौर पर, उनकी भूमिका अब सिर्फ उप मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं है — गृह मंत्रालय मिलने के बाद उनकी सियासी प्रभावशीलता पहले से कहीं अधिक मानी जा रही है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम बीजेपी की बढ़ती सत्ता को दर्शाता है। गृह मंत्रालय का अधिकार अगर बीजेपी के डिप्टी सीएम के पास है, तो बड़ी नीतिगत फैसलों में उनकी भूमिका और निर्णायक हो जाएगी।

नीतीश कुमार की इस रणनीति को कुछ लोग “पावर-शेयरिंग का नया युग” कह रहे हैं — उन्होंने अपनी ही पार्टी के भीतर और गठबंधन संरचना में संतुलन बनाए रखने के लिए यह फैसला लिया है।

राजनीतिक गलियारों में यह भी कहा जा रहा है कि सम्राट चौधरी अब सिर्फ एक उपमुख्यमंत्री नहीं, बल्कि सरकार के नए पावर-हब के रूप में उभर सकते हैं। उनके पास गृह मंत्रालय का नियंत्रण होने से पुलिस ट्रांसफर, संवेदनशील मामलों की निगरानी और सुरक्षा से जुड़ी सभी अहम चीज़ें तय करने की शक्ति आ गई है।

इसके अलावा, अन्य विभागों में भी मंत्री-बंटवारे में कई उल्लेखनीय बदलाव हुए हैं: विजय कुमार सिन्हा को खनन और भू-विकास विभाग मिला है, मंगल पांडेय को स्वास्थ्य और कानून मंत्रालय, जबकि दिलीप जायसवाल को उद्योग मंत्रालय सौंपा गया है।

यह नया मंत्रिमंडल गठबंधन के अंदर की ताकत की पुनर्स्थापना और एक संतुलित सत्ता संरचना बनाने का संकेत देता है। नीतीश कुमार, जिन्होंने लंबे समय तक गृह मंत्रालय अपने पास रखा, इस बार सत्ता में साझेदारी को ज्यादा महत्व दे रहे हैं — और उसी का परिणाम यह पावर-स्ट्रक्चर का फेरबदल है।

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