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शहबाज़ शरीफ और आसिम मुनीर के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग तेज

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मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और अमेरिका-ईरान के बीच संभावित बड़े युद्ध को टालने में पाकिस्तान की कूटनीतिक भूमिका चर्चा का केंद्र बन गई है। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच हुए दो हफ्तों के अस्थायी युद्धविराम को पाकिस्तान की मध्यस्थता का परिणाम बताया जा रहा है, जिसे लेकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और सेना प्रमुख Asim Munir के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की मांग उठने लगी है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जब अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष तेजी से बढ़ रहा था और हालात बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहे थे, तब पाकिस्तान ने पर्दे के पीछे रहकर कूटनीतिक प्रयास तेज किए। पाकिस्तान ने अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के बीच लगातार बातचीत करवाई और एक ऐसा माहौल तैयार किया जिसमें दोनों पक्ष युद्धविराम के लिए तैयार हुए।

बताया जा रहा है कि इस संघर्ष के दौरान स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि अमेरिका बड़े हमले की तैयारी में था और ईरान भी जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार था। ऐसे में पाकिस्तान ने आखिरी समय में बातचीत को टूटने से बचाया और अमेरिका से यह आश्वासन लिया कि वह इजरायल की सैन्य कार्रवाई को सीमित करेगा, जो ईरान की मुख्य शर्त थी।

8 अप्रैल 2026 को घोषित इस युद्धविराम के तहत दोनों देशों ने दो हफ्तों तक संघर्ष रोकने पर सहमति जताई, ताकि आगे शांति वार्ता का रास्ता खुल सके। इस कदम का वैश्विक स्तर पर स्वागत किया गया और संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों ने इसे शांति की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।

हालांकि, यह युद्धविराम पूरी तरह स्थिर नहीं माना जा रहा है। कुछ ही घंटों के भीतर इसके उल्लंघन की खबरें भी सामने आईं, जिससे इसकी नाजुक स्थिति उजागर होती है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने खुद इस पर चिंता जताते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है।

इसी बीच पाकिस्तान के मीडिया और कुछ अंतरराष्ट्रीय हलकों में यह मांग उठ रही है कि इस कूटनीतिक सफलता के लिए शहबाज़ शरीफ और आसिम मुनीर को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित किया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अगर यह मध्यस्थता सफल नहीं होती, तो मध्य पूर्व में एक बड़ा युद्ध छिड़ सकता था, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता।

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान ने इस संकट में खुद को एक महत्वपूर्ण वैश्विक कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है। हालांकि, आगे की वार्ताओं और स्थायी समाधान पर ही यह तय होगा कि यह पहल इतिहास में कितनी बड़ी मानी जाएगी।

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