Site icon Prsd News

पाकिस्तान में सेना बनाम राजनीति की जंग तेज, मौलाना फजलुर रहमान ने आर्मी चीफ आसिम मुनीर को चुनाव लड़ने की खुली चुनौती

images 1 17

पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर सेना की भूमिका को लेकर बहस तेज हो गई है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (फज़ल) के प्रमुख मौलाना फजलुर रहमान ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें वर्दी उतारकर चुनाव लड़ने की खुली चुनौती दी है। एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यदि सेना देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहती है तो उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि चुनावी मैदान में उतरने के बाद ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि जनता वास्तव में किसके साथ खड़ी है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान में सेना के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

मौलाना फजलुर रहमान ने अपने भाषण में पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और सरकार के साथ-साथ सैन्य नेतृत्व भी स्थिति को नियंत्रित करने में असफल रहा है। उनका कहना था कि जिन क्षेत्रों में लगातार हिंसा और आतंकी घटनाएं हो रही हैं, वहां आम नागरिक सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सेना का ध्यान सुरक्षा चुनौतियों से अधिक राजनीतिक मामलों में लगा हुआ है, जिससे देश के कई हिस्सों में अस्थिरता बढ़ी है।

विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान के इतिहास में सेना और राजनीति का संबंध हमेशा विवादों में रहा है। हालांकि कई राजनीतिक नेताओं ने समय-समय पर सैन्य हस्तक्षेप की आलोचना की है, लेकिन मौलाना फजलुर रहमान का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उन्होंने सीधे सेना प्रमुख को चुनावी राजनीति में उतरने की चुनौती दी है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र में जनता का जनादेश ही सर्वोच्च होना चाहिए और किसी भी संस्था को संविधान से ऊपर नहीं माना जा सकता। उनके इस बयान ने पाकिस्तान की राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मौलाना फजलुर रहमान कभी पाकिस्तान की सत्ता समीकरणों में अहम भूमिका निभा चुके हैं और अतीत में कई बड़े राजनीतिक गठबंधनों का हिस्सा रहे हैं। लेकिन अब उनका सेना के शीर्ष नेतृत्व पर इस तरह का सीधा हमला यह संकेत देता है कि पाकिस्तान में राजनीतिक दलों और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। दूसरी ओर, सेना की ओर से फिलहाल इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। हालांकि पाकिस्तान में सैन्य नेतृत्व पर सार्वजनिक टिप्पणी को लेकर पहले भी कई बार विवाद और कानूनी कार्रवाई देखने को मिली है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश में राजनीतिक दलों और सेना के बीच टकराव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर पाकिस्तान की आंतरिक स्थिरता, शासन व्यवस्था और आगामी राजनीतिक घटनाक्रम पर पड़ सकता है। पहले से ही आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई, आतंकवाद और विभिन्न प्रांतों में असंतोष जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे पाकिस्तान के लिए यह राजनीतिक विवाद नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार, सेना और विपक्षी दल इस मुद्दे पर किस तरह की रणनीति अपनाते हैं और क्या यह बयान केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर पाकिस्तान की राजनीति में किसी बड़े घटनाक्रम की भूमिका तैयार करता है।

Exit mobile version