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भोजपुरी स्टार पवन सिंह ने बीजेपी की थाम ली कमान — अमित शाह, उपेंद्र कुशवाहा समेत अन्य नेताओं से मुलाकात

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भोजपुरी सिनेमा के लोकप्रिय कलाकार और गायक पवन सिंह ने आज एक अनपेक्षित राजनीतिक कदम उठाया है — उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सदस्यता ले ली है। इस घोषणा को उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से किया, जिसमें उन्होंने बताया कि आज उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह, पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और उपेंद्र कुशवाहा से मुलाकात की और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया।

पवन सिंह ने अपनी पोस्ट में यह भी लिखा कि यह तस्वीर उन लोगों के दिलों पर असर करेगी जो जातिवादी राजनीति को पोषण देते हैं — वे “संस्कारी राजनीति के पोषकों” को यह संदेश देना चाहते हैं कि बिहार को विकसित करने का सपना साझा किया जाना चाहिए।

यह कदम बिहार की राजनीति के परिदृश्य में एक नया मोड़ ला सकता है। पवन सिंह पहले भी राजनीतिक सफर में सक्रिय रहे हैं। वे 2024 के लोकसभा चुनाव में कराकट क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार बने और उस समय भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार उपेंद्र कुशवाहा के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे थे। उस चुनाव में पवन सिंह को लाखों मत मिले, और उन्होंने भाजपा-कुशवाहा की विरुद्ध स्थिति को भी चुनौती दी थी, जिससे भाजपा गठबंधन को भारी मत विभाजन का सामना करना पड़ा।  इसके बाद उन्हें भाजपा द्वारा पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था।

इस समय भाजपा के लिए पवन सिंह की साख और लोकप्रियता महत्वपूर्ण हो सकती है, खासकर शाहाबाद क्षेत्र में, जहाँ जातीय समीकरण और स्टारवाद दोनों ही राजनीति में निर्णायक भूमिका खेलते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के बिहार प्रभारी और अमित शाह स्तर पर यह रणनीति तैयार की गई होगी, ताकि राजपूत समुदाय के मत और स्टार वोटों को भाजपा के पक्ष में खींचा जा सके।

पवन सिंह की वापसी और भाजपा में आज की एंट्री इस प्रकार देखी जा रही है कि वे एक से दो विधानसभाओं की सीटों की संभावनाएँ मांग सकते हैं। इसके साथ ही, उनके शामिल होने के बाद विपक्षी दलों ने इसे एक तरह की “सांप लोटने” वाली घटना बताया है — यानी वे कह रहे हैं कि भाजपा में पवन सिंह की एंट्री से कुछ विपक्षी तत्व परेशान होंगे, कुछ लोग बदलाब की दृष्टि से इसे देखा जाना चाहिए।

भविष्य में यह देखने की राह है कि पवन सिंह को किस क्षेत्र से चुनाव लड़ाया जाएगा — विधानसभा, लोकसभा, या सम्भवतः राज्यसभा — और भाजपा उन्हें किस तरह की जिम्मेदारियाँ सौंपेगी। इस कदम से बिहार की राजनीति, दल संभावनाएँ और चुनावी समीकरणों में बड़े बदलाव संभव हैं।

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