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RBI अगस्त में रेपो रेट रख सकता है स्थिर, मजबूत GDP ग्रोथ के बावजूद SBI रिसर्च ने जताई संभावना

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भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की आगामी मौद्रिक नीति बैठक से पहले एसबीआई रिसर्च की एक रिपोर्ट ने ब्याज दरों को लेकर अहम अनुमान पेश किया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश की आर्थिक वृद्धि मजबूत रहने के बावजूद RBI अगस्त की मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट में किसी तरह का बदलाव नहीं कर सकता। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और महंगाई से जुड़े जोखिमों को देखते हुए केंद्रीय बैंक फिलहाल “वेट एंड वॉच” की रणनीति अपना सकता है।

एसबीआई रिसर्च का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत से अधिक रह सकती है, जो कई विश्लेषकों के पूर्वानुमानों से बेहतर होगी। मजबूत सरकारी पूंजीगत व्यय, सेवा क्षेत्र का अच्छा प्रदर्शन और घरेलू मांग में मजबूती को इस वृद्धि का प्रमुख आधार माना गया है। इसके बावजूद रिपोर्ट का कहना है कि केवल बेहतर विकास दर के आधार पर ब्याज दरों में बदलाव की संभावना कम है, क्योंकि RBI का मुख्य उद्देश्य महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक स्थिरता बनाए रखना भी है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव लगातार बढ़ रहे हैं। पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक व्यापार पर दबाव और ऊर्जा कीमतों में संभावित बढ़ोतरी जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। यदि कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आता है तो उसका असर महंगाई पर भी पड़ सकता है। ऐसे हालात में RBI जल्दबाजी में कोई बड़ा फैसला लेने के बजाय परिस्थितियों का आकलन करना पसंद करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं होता है तो फिलहाल होम लोन, ऑटो लोन और अन्य बैंकिंग ऋणों की ब्याज दरों में भी तत्काल कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिलेगा। इससे मौजूदा EMI भर रहे ग्राहकों को राहत मिलेगी, जबकि बैंक भी अपनी ऋण और जमा दरों में स्थिरता बनाए रख सकते हैं। हालांकि भविष्य में महंगाई और वैश्विक परिस्थितियों के आधार पर RBI अपनी नीति में बदलाव कर सकता है।

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में बनी हुई है। विनिर्माण, सेवा क्षेत्र और सरकारी निवेश से विकास को समर्थन मिल रहा है, लेकिन बाहरी जोखिम अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऐसे में RBI की आगामी मौद्रिक नीति पर उद्योग जगत, बैंकिंग क्षेत्र और निवेशकों की नजरें टिकी रहेंगी। यदि केंद्रीय बैंक रेपो रेट को यथावत रखता है तो यह आर्थिक वृद्धि और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखने की उसकी रणनीति का हिस्सा माना जाएगा।

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