मुंबई और लातूर — महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया विवाद गरमाता हुआ दिखाई दे रहा है, जब भारतीय जनता पार्टी (BJP) के महाराष्ट्र प्रदेशाध्यक्ष रवींद्र चव्हाण द्वारा दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बारे में दिए गए एक बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। चव्हाण ने एक सभा में कहा कि “लातूर से विलासराव देशमुख की यादें मिटाई जाएँगी”, इस बयान का भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच उत्साह के संदर्भ में उन्होंने प्रचार करते हुए उपयोग किया था, लेकिन यह टिप्पणी तुरंत ही विरोध और आलोचना की आग बन गई।
इस बयान के बाद बॉलीवुड अभिनेता और देशमुख परिवार के सदस्य रितेश देशमुख ने सोशल मीडिया पर एक भावुक वीडियो संदेश जारी करते हुए चव्हाण के बयान पर तीव्र प्रतिक्रिया दी। रितेश ने कहाः “जो लोग जनता के लिए जीते हैं, उनके नाम लोगों के दिलों में कोर दिए जाते हैं; लिखे हुए को तो मिटाया जा सकता है, लेकिन दिलों में कोरे गए नाम को नहीं।” उन्होंने यह भी कहा कि उनके पिता की यादें और योगदान महाराष्ट्र के लोगों के मन में सदैव जीवित रहेंगी, चाहे कोई भी बयान दे दे।
रितेश के इस जवाब ने न सिर्फ महाराष्ट्र में राजनीति की दिशा बदल दी है बल्कि पूरे विपक्ष और जनमानस में एक व्यापक बहस छेड़ दी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने चव्हाण के बयान की कड़ी आलोचना की और इसे विलासराव देशमुख के योगदान और विरासत को कमतर आंकने वाला बयान करार दिया। कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि यह प्रकार का बयान सत्ता के अहंकार और उस विरासत के प्रति अज्ञानता को दर्शाता है जो देशमुख ने महाराष्ट्र के विकास के लिए छोड़ी थी।
राजनीति विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद मात्र एक बयान से कहीं आगे बढ़ गया है और महाराष्ट्र के आगामी चुनावी माहौल के अनुरूप राजनीतिक गणित और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन गया है। लातूर, जहां विलासराव देशमुख का गहरा राजनीतिक प्रभाव रहा है, वहां इस बयान को लेकर स्थानीय लोगों में भी संवेदनशील प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं, जिनमें इसे ‘लातूर की अस्मिता का अपमान’ भी कहा गया है।
इसके अलावा, रितेश देशमुख के वीडियो पर सोशल मीडिया पर सार्वजनिक प्रतिक्रियाएँ भी तेज़ी से फैल रही हैं, जिसमें नागरिकों ने उनके पिता के प्रति सम्मान और चव्हाण के बयान पर कड़ी निन्दा व्यक्त की है। कुछ समर्थक रितेश के शब्दों को राजनीति और सम्मान के बीच सामंजस्य का बलवान संदेश बता रहे हैं, जबकि आलोचक यह कहते हैं कि सार्वजनिक बयानबाज़ी से राजनीति और ध्रुवीकृत होती जा रही है।
इस विवाद ने राजनीतिक दलों के बीच अभिव्यक्ति की सीमा, राजनैतिक सम्मान और रणनीतिक बयानबाज़ी जैसे मुद्दों को भी अधर में लाकर रख दिया है। कहीं यह केवल एक नेता की विरासत बचाने की कोशिश है, तो दूसरी ओर यह राजनीतिक दलों के बीच भावनात्मक और चुनावी लड़ाई का एक नया मोड़ भी माना जा रहा है। आगामी दिनों में इस बयान से जुड़े बयान और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ सामने आना जारी रहने की संभावना है।
