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पुणे में एस. जयशंकर का भाषण: बदलते वैश्विक परिदृश्य से लेकर महाभारत-रामायण तक, विदेश नीति पर दीप विचार

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पुणे (महाराष्ट्र) में शनिवार को सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के 22वें दीक्षांत समारोह में भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक राजनीति, बदलते ताकत के केंद्र और देश की विदेश नीति को लेकर एक विस्तृत और विचारोत्तेजक भाषण दिया। समारोह में छात्रों, शिक्षकों तथा विशेषज्ञों के सामने जयशंकर ने वैश्विक परिदृश्य को समझाने के लिए इतिहास, दर्शन और भारतीय संस्कृति का उपयोग करते हुए गहरी अंतर्दृष्टि साझा की।

जयशंकर ने कहा कि आज की दुनिया एक-तरफा शक्तियों के नियंत्रण का विश्व नहीं रही है, बल्कि कई ऐसे केंद्र उभर रहे हैं जहां से राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक प्रभाव कार्य कर रहा है। किसी भी एक देश के लिए यह संभव नहीं कि वह सभी मुद्दों पर अपनी इच्छाओं को थोप सके। उन्होंने इसे एक बहु-ध्रुवीय (multipolar) विश्व व्यवस्था का संकेत बताया, जहां देशों के बीच सहयोग, बातचीत और रणनीतिक संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है।

अपने भाषण में जयशंकर ने भारत की संस्कृति और इतिहास के महान ग्रंथों का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर आज कोई पूछे कि “सबसे महान कूटनीतिक क्षमता किसमें है?”, तो उनके अनुसार महाभारत के भगवान कृष्ण और रामायण के हनुमान आधुनिक कूटनीति के प्रतीक हैं। कृष्ण का रणनीतिक विचार और हनुमान का सूचनात्मक कार्य वैश्विक राजनीति के संदर्भ में आज भी सार्थक हैं। ऐसा न करने से हम अपनी सांस्कृतिक महानता के साथ अन्याय कर सकते हैं, इस बात पर उन्होंने जोर दिया।

जयशंकर ने विश्व की बदलती ताकतों पर बात करते हुए अमेरिका, चीन, यूरोप और रूस जैसे देशों का ज़िक्र किया और बताया कि वैश्विक आर्थिक व राजनीतिक संतुलन अब पहले जैसी स्थिति में नहीं रहा। उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ संवाद पहले से अधिक जटिल हो चुका है, चीन के साथ निपटना चुनौतीपूर्ण है, और रूस जैसे देशों के साथ रिश्तों को संतुलित रखना भी आसान नहीं है। इसी बहु-ध्रुवीय दुनिया में भारत को अपने हितों के अनुसार स्थान बनाना होगा

विदेश मंत्री ने पड़ोसी देशों के मामलों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत के लिए यूरोप एक महत्वपूर्ण साझेदार है और इसके साथ और अधिक सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत ने जब श्रीलंका में भारी चक्रवात आया, तब तुरंत सहायता पहुंचाई थी। कोरोना महामारी के दौरान भी कई देशों को वैक्सीन भारत से ही प्राप्त हुई। यह सब इस बात का प्रमाण है कि भारत समय-समय पर अपने पड़ोसियों के साथ मजबूत संबंध बनाना चाहता है और सहयोग को आगे बढ़ाता है।

जयशंकर ने छात्रों से कहा कि वे वैश्विक राजनीति को समझें और जब वे विदेश नीति के बारे में निर्णय लें, तो स्पष्ट रणनीति और गेम-प्लान के साथ आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि जो भी सकारात्मक पहलू देश के पक्ष में काम कर सकते हैं, उन्हें पहचान कर अपने हित में उपयोग में लाना चाहिए। युद्ध-विवाद, शक्ति-संतुलन और कूटनीति जैसी चुनौतियों को समझ पाना आज के युवाओं के लिए आवश्यक है, ताकि वे भविष्य में बेहतर वैश्विक नेतृत्व दे सकें।

जयशंकर के इस भाषण ने स्पष्ट कर दिया कि भारत अब वैश्विक राजनीति में एक सक्रिय, संतुलित और अभिनव भूमिका निभाना चाहता है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के विचार, रणनीति और सांस्कृतिक पहचान का मिश्रण इसे एक प्रभावशाली रणनीतिक खिलाड़ी बनाता है, जिसका प्रभाव भविष्य में और बढ़ सकता है।

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