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सबरीमाला से मस्जिद और ‘खतना’ तक: महिलाओं के अधिकार बनाम परंपरा की बड़ी बहस तेज

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देश में महिलाओं के धार्मिक अधिकारों को लेकर बहस एक बार फिर तेज होती नजर आ रही है, जिसकी जड़ Sabarimala Temple से जुड़े फैसले में मानी जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के 2018 के ऐतिहासिक फैसले ने मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देकर एक नई बहस को जन्म दिया था, जिसमें परंपरा और संवैधानिक अधिकारों के बीच टकराव खुलकर सामने आया। Supreme Court of India ने उस समय साफ कहा था कि जैविक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव संविधान के खिलाफ है।

यह फैसला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके बाद देश के कई धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठने लगे। आज यह मामला सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है, बल्कि मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश, पारसी महिलाओं के धार्मिक स्थलों में अधिकार और दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खतना’ जैसी प्रथाओं तक फैल चुका है।

सबरीमाला फैसले के बाद मुस्लिम महिलाओं के संगठनों ने भी मस्जिदों में बराबरी के अधिकार की मांग तेज कर दी। उनका तर्क है कि जब संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है, तो धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर लिंग के आधार पर रोक उचित नहीं ठहराई जा सकती। इस मुद्दे पर कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं और आने वाले समय में इस पर बड़ा फैसला आ सकता है।

इसी तरह दाऊदी बोहरा समुदाय में ‘खतना’ यानी महिला जननांग कटाव (FGM) की प्रथा भी लंबे समय से विवाद में है। एक पक्ष इसे धार्मिक परंपरा का हिस्सा मानता है, जबकि दूसरे पक्ष के अनुसार यह महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है और इसे खत्म किया जाना चाहिए। इस विषय पर भी अदालत में बहस जारी है और इसे महिला अधिकारों के बड़े मुद्दे के रूप में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन सभी मामलों की जड़ एक ही है—धर्म और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन। अदालत अब इस बात पर विचार कर रही है कि कौन-सी धार्मिक प्रथाएं ‘आवश्यक’ हैं और कौन-सी प्रथाएं संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं। यह बहस सिर्फ कानून तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के भीतर भी गहरी चर्चा का विषय बन चुकी है।

सबरीमाला मामले ने यह स्पष्ट कर दिया कि महिलाओं के अधिकारों को लेकर न्यायपालिका अब ज्यादा सक्रिय भूमिका निभा रही है। हालांकि इसके बाद देश के कई हिस्सों में विरोध भी देखने को मिला, जिससे यह साफ हुआ कि सामाजिक स्वीकृति और कानूनी फैसलों के बीच अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है।

आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट की बड़ी संविधान पीठ इन सभी जुड़े मामलों—सबरीमाला, मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, पारसी परंपराएं और बोहरा समुदाय में ‘खतना’—पर व्यापक सुनवाई कर सकती है। यह फैसला न सिर्फ महिलाओं के अधिकारों को नया आयाम देगा, बल्कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन को भी परिभाषित करेगा।

इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या परंपराएं संविधान से ऊपर हो सकती हैं, या फिर आधुनिक समाज में समानता और अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। फिलहाल, यह बहस जारी है और इसका असर आने वाले समय में देश की सामाजिक और कानूनी दिशा तय कर सकता है।

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