भारत की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने उन्नाव रेप मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) के जजों के खिलाफ उठ रही टिप्पणियों और सोशल मीडिया पर होने वाली आलोचनाओं पर गंभीर प्रतिक्रिया व्यक्त की है। यह टिप्पणी अदालत की उस सुनवाई के दौरान आई है, जब सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाई, जिसमें दोषी पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को कुछ शर्तों पर जमानत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को स्थगित (stay) कर दिया है ताकि सेंगर को तत्काल रिहा न किया जा सके और मामले की समीक्षा की जा सके।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant) की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर न्यायाधीशों के खिलाफ की जा रही टिप्पणियाँ बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और अनुचित हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि कोर्ट सिस्टम को बदनाम करने और राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें नहीं होनी चाहिए। CJI ने यह भी कहा कि न्यायपालिका “ivory towers (अलग, अलगथर)” में नहीं बैठी है, बल्कि समाज की भावनाओं को समझती है और जिम्मेदारी से काम करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अगर किसी को उच्च न्यायालय के फैसले से असहमति है तो विवाद को सड़कों पर या सोशल मीडिया पर ले जाकर जजों पर आरोप नहीं लगाने चाहिए, बल्कि वैधानिक प्रक्रिया अपनाते हुए कोर्ट में चुनौती देनी चाहिए। अदालत ने रेखांकित किया कि लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि है और किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुचित आरोप न्याय तंत्र के प्रति विश्वास को कमजोर कर सकते हैं।
साथ ही, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी उच्च न्यायालय के जजों का समर्थन करते हुए कहा कि वे अपने क्षेत्र के काबिल और ईमानदार अधिकारी हैं और उन पर लगाए जा रहे बेबुनियाद आरोपों को पूरी तरह से खारिज किया जाना चाहिए।
उन्नाव रेप मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायपालिका में गलतियों की गुंजाइश होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायिक प्रक्रिया पर संदेह किया जाए या जजों को बदनाम किया जाए। अदालत ने जोर देकर कहा कि कानून के मुताबिक विवादों को कोर्ट में ही सुलझाया जाना चाहिए, न कि हाई न्यायालय के जजों के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से बयानबाजी करके।
यह प्रतिक्रिया ऐसे समय में आई है जब उन्नाव रेप केस देशभर में चर्चा में है और सामाजिक प्रतिक्रिया भी तेज है। इससे पहले उच्च न्यायालय ने सेंगर को सशर्त जमानत दी थी, जिसे लेकर देशभर में प्रदर्शन और विवाद भी हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी से यह संदेश जाता है कि न्यायपालिका के स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, और आरोपों या आलोचनाओं को लेकर भी उचित वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख यह रहा है कि न्याय की लड़ाई कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत ही लड़ी जा सकती है, न कि सोशल मीडिया या सार्वजनिक बहस के माध्यम से जजों पर व्यक्तिगत आरोप लगाने के जरिए। अदालत का मानना है कि इससे न केवल न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचती है, बल्कि आम जनता के न्याय तंत्र में विश्वास को भी प्रभावित किया जा सकता है।
