Site icon Prsd News

“हम छुट्टियों में भी काम करते हैं…” सुप्रीम कोर्ट के जजों का छलका दर्द, लगातार दबाव और मानसिक थकान पर उठाए सवाल

supreme court

नई दिल्ली में आयोजित Supreme Court Bar Association की एक अहम कॉन्फ्रेंस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपने काम के बोझ और मानसिक दबाव को लेकर खुलकर बात की। जस्टिस B. V. Nagarathna ने कहा कि आम धारणा के विपरीत जजों को छुट्टियों में आराम का समय नहीं मिलता, बल्कि वे उन्हीं दिनों में लंबित मामलों के फैसले लिखने का काम करते हैं। उन्होंने बताया कि कोर्ट की सुनवाई के अलावा भी जजों की जिम्मेदारियां काफी बड़ी होती हैं और फैसला लिखने की प्रक्रिया अक्सर देर रात, वीकेंड और छुट्टियों तक चलती रहती है।

कॉन्फ्रेंस के दौरान जस्टिस Dipankar Datta ने भी जजों की कार्यस्थितियों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जज सुबह 10:30 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक लगातार मामलों की सुनवाई करते हैं, जिसके लिए उन्हें पूरी तरह एकाग्र रहना पड़ता है। इसके बावजूद उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे कोर्ट के समय के बाद भी तुरंत फैसले सुनाएं। उन्होंने साफ कहा कि दिमाग को भी आराम की जरूरत होती है और जजों पर अत्यधिक दबाव डालना न्याय की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है।

जस्टिस नागरत्ना ने यह भी बताया कि जजों की भूमिका दोहरी होती है—एक तरफ वे कोर्ट में मामलों की सुनवाई करते हैं और दूसरी ओर उन्हें फैसलों को विस्तार से लिखना भी होता है, जो समय लेने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि कई बार जज छुट्टियों में घूमने या आराम करने के बजाय लंबित जजमेंट्स को पूरा करने में लगे रहते हैं। इसके अलावा उन्होंने यह भी माना कि सरकार देश की सबसे बड़ी मुकदमेबाज है, जिससे अदालतों पर मामलों का बोझ और बढ़ जाता है।

इस चर्चा में यह भी सामने आया कि समाज में जजों को लेकर एक धारणा बनी हुई है कि वे किसी “दैवीय भूमिका” में होते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वे भी इंसान हैं और लगातार मानसिक दबाव में काम करते हैं। जस्टिस दत्ता ने कहा कि अगर जजों को पर्याप्त आराम नहीं मिलेगा, तो इससे फैसलों में गलती की संभावना बढ़ सकती है, जो न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

इस कॉन्फ्रेंस के जरिए न्यायपालिका के भीतर की चुनौतियों और कार्यप्रणाली की वास्तविक तस्वीर सामने आई है, जिससे यह साफ होता है कि न्याय देने की प्रक्रिया केवल कोर्ट रूम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे लगातार मेहनत, समय और मानसिक संतुलन की जरूरत होती है।

Exit mobile version