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सुप्रीम कोर्ट की दोटूक टिप्पणी, कहा- अदालत मनोरंजन चैनल नहीं बन सकती, हर सुनवाई का लाइव प्रसारण संभव नहीं

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सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की कार्यवाही के लाइव प्रसारण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालय किसी भी स्थिति में “मनोरंजन चैनल” नहीं बन सकता। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि हर कार्यवाही को सार्वजनिक प्रसारण का माध्यम बनाना। कोर्ट ने कहा कि सभी मामलों की लाइव स्ट्रीमिंग व्यावहारिक नहीं है और इससे न्यायिक कार्यवाही की गंभीरता तथा निष्पक्षता भी प्रभावित हो सकती है।

पीठ ने कहा कि लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर पहले से निर्धारित दिशा-निर्देश मौजूद हैं और इन्हीं के आधार पर तय किया जाता है कि किन मामलों का सीधा प्रसारण किया जाएगा। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि प्रत्येक याचिका या सुनवाई को लाइव दिखाने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती। न्यायालय का मुख्य उद्देश्य कानून के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई करना है और तकनीक का उपयोग भी उसी सीमा तक होना चाहिए, जहां वह न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत बनाए।

सुनवाई के दौरान न्यायालय ने यह भी कहा कि अदालत की कार्यवाही को केवल सार्वजनिक आकर्षण या मनोरंजन का माध्यम नहीं बनाया जा सकता। न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायालय की गरिमा, पक्षकारों के अधिकार और निष्पक्ष सुनवाई सर्वोच्च प्राथमिकता हैं। इसलिए लाइव स्ट्रीमिंग का निर्णय मामले की प्रकृति और न्यायिक आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब न्यायिक पारदर्शिता बढ़ाने के लिए अदालतों में डिजिटल तकनीक और लाइव स्ट्रीमिंग के दायरे को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पारदर्शिता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ न्यायिक अनुशासन और अदालत की गरिमा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में भी लाइव स्ट्रीमिंग से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट अपने निर्धारित दिशानिर्देशों और न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप ही निर्णय लेगा।

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