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तमिलनाडु चुनाव 2026

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तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार एक बेहद चौंकाने वाला राजनीतिक ट्रेंड सामने आया है, जहां DMK, कांग्रेस, AIADMK और बीजेपी—चारों प्रमुख दलों ने एक भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। यह स्थिति पिछले लगभग 35 वर्षों में पहली बार देखने को मिली है, जिसने राज्य की बदलती सामाजिक और राजनीतिक संरचना को उजागर कर दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण तमिलनाडु की “द्रविड़ राजनीति” और सामाजिक न्याय की विचारधारा है। पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन से निकली इस राजनीति का केंद्र ब्राह्मणवाद के विरोध और पिछड़ी जातियों (OBC) तथा दलित समुदायों के सशक्तिकरण पर रहा है। यही वजह है कि आज भी राज्य की प्रमुख पार्टियां अपने पारंपरिक वोट बैंक—ओबीसी और एससी/एसटी समुदाय—को प्राथमिकता देती हैं और ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने से बचती हैं।

इसके अलावा “नंबर गेम” भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है। तमिलनाडु की कुल आबादी में ब्राह्मण समुदाय की हिस्सेदारी करीब 3% ही है, जबकि अन्य जातियों जैसे वन्नियार, थेवर, गौंडर और दलित समुदाय का वोट प्रतिशत काफी ज्यादा है। ऐसे में राजनीतिक दल उन्हीं वर्गों को टिकट देना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं, जिनसे जीत की संभावना अधिक होती है।

राज्य में लागू 69% आरक्षण व्यवस्था भी इस समीकरण को प्रभावित करती है। तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से सामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में ब्राह्मण उम्मीदवार उतारना कई दलों को अपने मुख्य वोट बैंक को नाराज करने वाला कदम लग सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि कभी AIADMK की नेता रही J. Jayalalithaa खुद ब्राह्मण समुदाय से थीं और उनके दौर में इस वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलता था। लेकिन उनके निधन के बाद पार्टी की रणनीति में बड़ा बदलाव आया है और अब ब्राह्मण उम्मीदवारों से दूरी साफ नजर आ रही है।

वहीं, कुछ छोटी और नई पार्टियां इस खाली जगह को भरने की कोशिश कर रही हैं। अभिनेता Vijay की पार्टी TVK और सीमन की पार्टी NTK ने कुछ ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर अलग राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है।

कुल मिलाकर, तमिलनाडु की राजनीति में यह बदलाव सिर्फ उम्मीदवार चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और वोट बैंक की राजनीति का बड़ा संकेत है। आने वाले चुनाव नतीजे यह तय करेंगे कि यह रणनीति पार्टियों के लिए कितनी सफल साबित होती है।

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