
बिहार की सियासी हलचल इन दिनों एक नए मोड़ पर पहुंच गई है, जहाँ नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की भविष्य की भूमिका को लेकर राजनीति गरमा गई है। खबरों और राजनीतिक दावों के अनुसार, कुछ विपक्षी और सरकार समर्थक नेता यह दावा कर रहे हैं कि तेजस्वी यादव नेता प्रतिपक्ष की पदवी को बचा नहीं पाएंगे और उनकी राजनीतिक स्थिति संकट में है। इस विषय पर राजनीतिक बहस तेज़ है, खासकर 2025 के विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता-प्राप्त राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और विपक्षी महागठबंधन (RJD-Congress समेत) के बीच असंतुलन के बीच।
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में NDA को स्पष्ट बहुमत मिला और राजद-महागठबंधन को बहुत कम सीटें मिलीं, जिससे तेजस्वी यादव की स्थिति कमजोर दिख रही है। बिहार में कुल 243 सीटों में से NDA ने करीब 202 सीटें जीतीं, जबकि तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला गठबंधन महज 35 सीटों के आसपास रह गया, जिससे विपक्षी भूमिका पहले से कठिन होती चली गई।
हालाँकि कुछ रिपोर्टों के अनुसार, महागठबंधन के विधायकों ने तेजस्वी यादव को विधान सभा में महागठबंधन (Grand Alliance) के नेता और नेता प्रतिपक्ष के तौर पर चुना था, जो एक प्रकार से पार्टी के भीतर उनके नेतृत्व को मान्यता देता है। महागठबंधन के नेताओं ने यह भी कहा था कि वे विधानसभा सत्र में मिलकर रणनीति बनाएँगे और एक सकारात्मक विपक्ष के रूप में कार्य करेंगे, लेकिन चुनाव परिणामों के नतीजे तथा घटती संख्या ने इस भूमिका को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
राजद विरोधियों का कहना है कि तेजस्वी यादव विरोधी दल की शक्ति को पर्याप्त रूप से जोड़ नहीं पाए हैं, और कई विधायक भाजपा-प्रभावित सत्ताधारी दलों की ओर संपर्क में हैं, जिससे उनके सुदृढ़ नेता प्रतिपक्ष बनने पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है। एक मंत्री के अपने बयान के अनुसार 25 राजद विधायकों के भाजपा नेताओं के संपर्क में होने का दावा भी सामने आया है, जिसे राजद ने खंडन किया है, लेकिन यह दावा तेजस्वी की स्थिति को और संवेदनशील बना रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि तेजस्वी की भूमिका पर दबाव महागठबंधन के भीतर आंतरिक मतभेदों, कांग्रेस तथा अन्य सहयोगी दलों के साथ तालमेल की कमी, और राजद की चुनावी हार जैसी चुनौतियों के कारण बढ़ा है। भाजपा-जदयू के सफल चुनावी प्रबंधन और सत्ता में मजबूती ने विपक्षी खेमे को कमजोर कर दिया है, जिससे तेजस्वी को न केवल नेता प्रतिपक्ष के रूप में पहचान बनाए रखना कठिन लग रहा है, बल्कि उनकी पार्टी और गठबंधन के भीतर एकता की कमी ने भी स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बनाया है।
एक अन्य पहलू यह भी है कि तेजस्वी यादव की मौजूदगी और सियासी जिम्मेदारियों को लेकर भी विरोधियों ने उन पर कटाक्ष किये हैं, जैसे कि उन्हें विदेश भ्रमण के दौरान विधानसभा सत्र से दूर रहने पर तंज़ का सामना करना पड़ा। बिजली मंत्री जैसी नेताओं ने कहा कि यह व्यवहार नेता प्रतिपक्ष की भूमिका के अनुरूप नहीं है, जिससे राजनीतिक आलोचना और तेज़ हुई है।
इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच, तेजस्वी यादव और राजद नेतृत्व यह स्पष्ट कर चुके हैं कि वे अपने पद पर दृढ़ता से बने रहने का प्रयास करेंगे और विधान सभा में विचार विमर्श तथा जनता के मुद्दों को उठाते रहेंगे, चाहे विपक्ष की संख्या कम क्यों न हो। विपक्षी नेता ने घोषणा की है कि वे SIR, रोजगार, सार्वजनिक कल्याण और सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते रहेंगे तथा जनता के पक्ष में आवाज बुलंद करेंगे।
अब सियासी स्थिति यह है कि तेजस्वी यादव की नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी कितना समय तक सुरक्षित रहती है और क्या वे अपने विधायकों और गठबंधन सहयोगियों के समर्थन से अपनी स्थिति मजबूत कर पाते हैं, यह अगला बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। बिहार की राजनीति में यह विवाद आगे और तीव्र हो सकता है, क्योंकि सभी दल आने वाले वर्षों में संभावित गठबंधनों, चुनाव रणनीति और सत्ता संघर्ष को लेकर तैयारियाँ कर रहे हैं।



