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ममता बनर्जी को बड़ा झटका! TMC के 20 बागी सांसदों का नया दांव, छोटी पार्टी में विलय कर NDA को समर्थन

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देश की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति के साथ-साथ संसद के शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करने की क्षमता पैदा कर दी है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों ने ऐसा राजनीतिक दांव चला है, जिसकी चर्चा दिल्ली से लेकर कोलकाता तक हो रही है। जानकारी के अनुसार, TMC के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष एक नई रणनीति पेश करते हुए खुद को एक अलग राजनीतिक समूह के रूप में स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इन सांसदों ने सीधे भाजपा में शामिल होने के बजाय एक अपेक्षाकृत कम चर्चित राजनीतिक दल नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) के साथ विलय का रास्ता चुना है।

बताया जा रहा है कि यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम लंबे समय से चल रहे आंतरिक असंतोष का परिणाम है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC की हार के बाद पार्टी के भीतर असहमति लगातार बढ़ती गई। पहले विधायकों के बीच मतभेद सामने आए और अब यह संकट संसद तक पहुंच गया है। बागी सांसदों का दावा है कि उनके पास लोकसभा में TMC के दो-तिहाई से अधिक सांसदों का समर्थन है, जिससे वे दल-बदल कानून के तहत कानूनी सुरक्षा हासिल करने की स्थिति में आ सकते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू NCPI का नाम है। छह वर्ष पुरानी यह पार्टी मूल रूप से त्रिपुरा से जुड़ी मानी जाती है, हालांकि इसका पंजीकरण पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में है। अब तक राष्ट्रीय राजनीति में लगभग अनजान रही यह पार्टी अचानक सुर्खियों में आ गई है। 20 सांसदों के संभावित विलय के बाद NCPI लोकसभा में चौथी सबसे बड़ी पार्टी और NDA की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी बन सकती है। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे केवल दल-बदल नहीं बल्कि एक सोची-समझी संसदीय रणनीति मान रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार बागी सांसदों ने लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की भी मांग की है और संकेत दिए हैं कि वे संसद के भीतर NDA का समर्थन करेंगे। हालांकि उन्होंने अभी तक TMC के नाम और चुनाव चिन्ह पर दावा छोड़ने की औपचारिक घोषणा नहीं की है। माना जा रहा है कि पहले वे कानूनी विवादों से बचने के लिए अलग पार्टी में विलय का रास्ता अपना रहे हैं और भविष्य में पार्टी की वास्तविक पहचान पर भी दावा कर सकते हैं।

इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री और TMC प्रमुख Mamata Banerjee की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पार्टी नेतृत्व लगातार बागी सांसदों को मनाने की कोशिश करता रहा, लेकिन हालात नियंत्रण में नहीं आ सके। दूसरी ओर, पार्टी के वफादार नेताओं ने बागी सांसदों पर विश्वासघात के आरोप लगाए हैं और इसे लोकतांत्रिक जनादेश के खिलाफ बताया है।

दिल्ली में बागी सांसदों की केंद्रीय नेताओं के साथ बैठकों ने राजनीतिक अटकलों को और तेज कर दिया है। हालांकि भाजपा नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि पार्टी के दरवाजे सीधे तौर पर इन नेताओं के लिए नहीं खुले हैं, लेकिन NDA को समर्थन देने के उनके फैसले का स्वागत किया जा रहा है। इससे संसद में सत्तारूढ़ गठबंधन की ताकत और बढ़ सकती है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ सांसदों की बगावत नहीं बल्कि बंगाल की राजनीति में बड़े पुनर्गठन की शुरुआत हो सकती है। यदि बागी गुट अपनी एकजुटता बनाए रखने में सफल रहता है, तो इसका असर न केवल संसद में बल्कि पश्चिम बंगाल की भविष्य की राजनीति पर भी पड़ सकता है। आने वाले दिनों में लोकसभा अध्यक्ष का रुख, दल-बदल कानून की व्याख्या और TMC नेतृत्व की रणनीति इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी। फिलहाल इतना तय है कि ममता बनर्जी के सामने यह अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौतियों में से एक बन चुका है।

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