
बांग्लादेश में हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की भीड़ द्वारा की गई नृशंस हत्या की घटना ने पूरे उपमहाद्वीप को झकझोर कर रख दिया है। बालुका इलाके में हुई इस घटना में दीपू दास को पहले बेरहमी से पीटा गया और फिर उसके शव को आग के हवाले कर दिया गया। यह सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि कानून, इंसानियत और सामाजिक सौहार्द पर सीधा हमला था। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि भीड़ का उन्माद कब तक कानून पर भारी पड़ता रहेगा और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं।
इस जघन्य हत्या पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदानी का बयान सामने आया है, जो न सिर्फ कड़ा है बल्कि नैतिक साहस से भरा हुआ भी है। मदानी ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी इंसान को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। अगर कोई अपराध करता है तो उसे अदालत और कानून के दायरे में सजा मिलनी चाहिए, न कि भीड़ द्वारा मौत। उन्होंने कहा कि जब कोई मुसलमान किसी गैर-मुस्लिम की इस तरह हत्या करता है, तो यह जुर्म और भी गंभीर हो जाता है, क्योंकि इससे पूरे समुदाय की छवि को नुकसान पहुंचता है और नफरत को बढ़ावा मिलता है।
मौलाना मदानी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस्लाम किसी भी तरह की हिंसा, भीड़ द्वारा हत्या या नफरत की इजाजत नहीं देता। उन्होंने कट्टर सोच और धार्मिक उन्माद को समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। उनका कहना था कि ऐसी घटनाएं न सिर्फ एक देश की समस्या हैं, बल्कि पूरी मानवता के लिए कलंक हैं। उन्होंने बांग्लादेश सरकार से मांग की कि दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई हो और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
इस घटना के बाद भारत और बांग्लादेश दोनों देशों में आक्रोश देखने को मिला है। कई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन हुए और लोगों ने न्याय की मांग की। खासतौर पर हिंदू समुदाय में भय और असुरक्षा की भावना गहरी हुई है। सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने इसे सुनियोजित हिंसा बताते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे को उठाने की बात कही है।
दीपू दास की हत्या ने यह कड़वा सच सामने ला दिया है कि जब भीड़ उन्माद में बदल जाती है, तब सबसे पहले इंसानियत मरती है। मौलाना महमूद मदानी का बयान ऐसे समय में आया है, जब समाज को नफरत नहीं, बल्कि साहसिक सच और नैतिक नेतृत्व की सबसे ज्यादा जरूरत है। यह घटना और उस पर आई प्रतिक्रियाएं आने वाले समय में भारत-बांग्लादेश संबंधों, अल्पसंख्यक सुरक्षा और धार्मिक सौहार्द की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।



