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भारत ने चावल उत्पादन में चीन को पीछे छोड़ा

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भारत ने वैश्विक कृषि मानचित्र पर एक बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है—अब वह विश्व का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया है, जिसने लंबे समय तक शीर्ष पर रहे चीन को पीछे छोड़ दिया है। यह ऐतिहासिक उपलब्धि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 4 जनवरी 2026 को राजधानी नई दिल्ली में की गई एक घोषणा में साझा की, जिसमें उन्होंने बताया कि देश का कुल चावल उत्पादन अब लगभग 150.18 मिलियन टन (15.018 करोड़ टन) के स्तर तक पहुंच चुका है, जबकि चीन का उत्पादन लगभग 145.28 मिलियन टन ही रहा। इस प्रकार भारत ने मात्र आंकड़ों के आधार पर भी चीन को मात देते हुए यह गौरव हासिल किया है।

इस उपलब्धि को भारत की कृषि-उत्पादकता में नई क्रांति के रूप में देखा जा रहा है। कृषि मंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि गाँव-देहाँत के किसानों, शोधकर्ताओं, कृषि विश्वविद्यालयों और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जैसे संस्थानों की सामूहिक मेहनत का फल है। इस अवसर पर कृषि मंत्रालय ने 25 फसलों की 184 नई उच्च-उपज वाली बीज किस्में भी जारी कीं, जिनका उद्देश्य आगे उत्पादन को और बढ़ाना और किसानों की आमदनी को मजबूत करना है। ये नई किस्में जलवायु-अनुकूल, रोग-प्रतिरोधी और अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकों से लैस हैं, जो आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र में और प्रगति का मार्ग प्रशस्त करेंगी।

विश्लेषकों के मुताबिक़, इस उपलब्धि से भारत की खाद्य सुरक्षा और वैश्विक खाद्यान्न बाजार में भूमिका दोनों मजबूत हुई हैं। पहले भारत घरेलू मांग को प्राथमिकता देता था, लेकिन अब वह विश्व के कई देशों को चावल निर्यात भी कर रहा है। यह बदलाव खाद्य पदार्थों के वैश्विक आपूर्ति-शृंखला में भारत की स्थिति को और मजबूती प्रदान करता है। साथ ही, मजबूत उत्पादन के कारण भोजन की कमी वाले देशों को मदद करने की क्षमता भी बढ़ी है।

चावल उत्पादन में इस छलांग के पीछे एक बड़ी वजह नई उन्नत और उच्च-उपज वाली बीज प्रजातियाँ हैं। कृषि मंत्री ने बताया कि 1969 से अब तक देश में कुल 7,205 फसल किस्मों को मंज़ूरी दी जा चुकी है, जिनमें से लगभग आधी यानी 3,236 किस्में वर्तमान सरकार के कार्यकाल के दौरान ही विकसित और मंज़ूर हुई हैं। इससे कृषि अनुसंधान और बीज उत्पादन के क्षेत्र में भारत को जो बढ़त मिली है, वह साफ़ दिखाई देती है।

हालाँकि यह उपलब्धि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि बढ़ते उत्पादन के साथ विश्वसनीय और सतत खेती-प्रथाओं को अपनाना आवश्यक है। उदाहरण के तौर पर, चावल की खेती में बड़ी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है, जिससे भू-जल संसाधनों पर दबाव बढ़ सकता है और पर्यावरणीय संतुलन पर भी असर पड़ सकता है — यह मुद्दा पहले से कई विश्लेषकों के ध्यान में है।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भारत की इस उपलब्धि को कृषि क्षेत्र की मजबूती और आत्मनिर्भरता का प्रतीक माना है और बताया कि सरकार भविष्य में भी कृषक कल्याण, बीज शोध और फसल विविधता के क्षेत्र में नए कार्यक्रमों के जरिए प्रगति को और आगे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। नई बीज किस्मों के वितरण और उपलब्धता को तेज़ करने के निर्देश भी उन्होंने अपने विभागीय अधिकारियों को दिए हैं, ताकि किसान इन्हें जल्द से जल्द प्रयोग में ला सकें।

घटना की समय-सीमा पर ध्यान दें तो यह उपलब्धि 2025 की फसल सत्र की रिपोर्ट पर आधारित है, और अब 2026 में कृषि क्षेत्र की नीतियाँ और प्रोत्साहन किसानों को और अधिक प्रोत्साहित करेंगे। यह उपलब्धि न सिर्फ़ भारत की कृषि क्षमता को दर्शाती है बल्कि विश्व खाद्य सुरक्षा में भी भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाती है, जो कि आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक और सामाजिक बदलावों के संदर्भ में एक अहम कदम है।

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