
नई दिल्ली/वॉशिंगटन — भारत और पाकिस्तान के बीच मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) के दौरान पाकिस्तान ने 66 बार अमेरिका के पास बैठकें करने और हस्तक्षेप की गुहार लगाने का प्रयास किया, इसके ताज़ा दस्तावेज़ अब सामने आए हैं। यह खुलासा अमेरिकी सरकारी रिकॉर्ड्स और राजनयिक ईमेल-कॉल के सबूतों पर आधारित है, जो दिखाते हैं कि पाकिस्तान ने भारत के सैन्य अभियान को रोकने और युद्धविराम (ceasefire) लागू कराने के लिए अमेरिका में बड़ी मेहनत की।
पाकिस्तान द्वारा की गई यह कूटनीतिक कोशिश ऑपरेशन सिंदूर की शुरुआत से अंत तक चली, जब भारत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में नौ आतंकी ठिकानों पर लक्षित सैन्य प्रतिक्रिया की थी। इन दस्तावेज़ों से पता चलता है कि पाकिस्तानी राजनयिकों और डिफेंस अटैची ने अमेरिकी अधिकारियों, सांसदों और मीडिया से संपर्क करने के लिए लगभग 66 बैठकें आयोजित करने की गुजारिश की, ताकि वाशिंगटन भारत के ऑपरेशन को किसी तरह रोकने या दबाव डालने की कोशिश करे।
इन फ़ाइलों के अनुसार, यह व्यापक संपर्क न केवल व्हाइट हाउस और पेंटागन तक सीमित था, बल्कि अमेरिकी कांग्रेस, स्टेट डिपार्टमेंट और प्रमुख मीडिया संस्थाओं तक भी फैला हुआ था। पाकिस्तानी प्रतिनिधियों ने ई-मेल, फोन कॉल और व्यक्तिगत रूप से मिलने की रचनात्मक कोशिश की, जिसमें उन्होंने भारत के सैन्य अभियान के खिलाफ दबाव बनाने और सीज़फायर की स्थिति स्थापित करने के लिए अमेरिकी समर्थन मांगने की कोशिश की।
एक अन्य अहम पहलू यह है कि भारत-पाक युद्धविराम को लेकर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा यह दावा किया गया था कि उन्होंने मध्यस्थता कर संघर्ष को रोका था, लेकिन भारतीय सरकार और विदेश मंत्रालय ने इसे खारिज करते हुए कहा कि सीज़फायर पूरी तरह से दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य बातचीत और समन्वय के आधार पर हुआ, न कि तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से। भारत की तरफ से कहा गया कि मध्यस्थता का कोई औपचारिक अनुरोध नहीं आया और बातचीत मुख्य रूप से बिल्कुल द्विपक्षीय थी।
पाकिस्तान की यह कूटनीतिक उकसाहट सायद इसी वजह से थी कि वह ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिले कठोर जवाब से राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव हासिल करना चाहता था। इससे पहले नवंबर 2025 में द न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी रिपोर्ट किया था कि पाकिस्तान ने छः अमेरिकी लॉबिंग फर्मों के साथ लगभग 5 मिलियन डॉलर के वार्षिक अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे ताकि वह ट्रंप प्रशासन तक जल्दी और प्रभावी पहुँच बना सके। उस समझौते के कुछ ही सप्ताह बाद पाकिस्तान के सेना प्रमुख को व्हाइट हाउस में आमंत्रित भी किया गया था, जो इस दबाव रणनीति का हिस्सा माना गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रयास यह दिखाता है कि ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों के दौर में केवल युद्ध-क्षेत्र की लड़ाई नहीं, बल्कि *राजनयिक, मीडिया और विदेशी समर्थन हासिल करने की गतिविधियाँ भी गहन होती हैं। इस घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि पाकिस्तान सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक मंचों सभी पर अपनी भूमिका मज़बूत करने का प्रयास कर रहा था, जबकि भारत लगातार यह संकेत देता रहा कि किसी भी तरह की मध्यस्थता की बजाय सीधे द्विपक्षीय समाधान और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम ही प्राथमिकता हैं।
यह मामला अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऑपरेशन सिंदूर के प्रभाव और भारत-पाकिस्तान संघर्ष के समाधान की प्रक्रियाओं को लेकर एक नया सवाल खड़ा कर रहा है — कि किस हद तक तटस्थ देश अपने प्रभाव का इस्तेमाल दो पड़ोसी राष्ट्रों के बीच तनाव को कम करने के लिए कर सकते हैं, और किस हद तक यह प्रयास असफल या पक्षपाती साबित होता है।



