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क्या पश्चिम बंगाल राष्ट्रपति शासन की ओर बढ़ रहा है?

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पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों बेहद उथल-पुथल भरी और तनावपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सरकार और केन्द्र-निवासी भाजपा के बीच टकराव चरम पर पहुँचता दिख रहा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और इनकम टैक्स विभाग द्वारा I-PAC जैसे राजनीतिक सलाहकार समूह पर छापों का सिलसिला हुआ, जिससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद विरोध में मैदान में उतर गईं और उन्होंने एजेंसियों के खिलाफ प्रतिरोध जताया। इससे विपक्षी दलों ने हमला तेज़ कर दिया है और भाजपा समेत अन्य पार्टियों ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग तेज़ कर दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला 2026 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले सामने आया है और इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि राज्य में कानून-व्यवस्था और संवैधानिक तंत्र बिगड़ता जा रहा है और ऐसे में केंद्र सरकार को धारा 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने पर विचार करना चाहिए। धारा 356 के तहत राज्य सरकार को भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू किया जा सकता है, यदि संविधान के अनुसार राज्य में “संवैधानिक व्यवस्था विफल” मानी जाए।

हालाँकि, धारा 356 का इस्तेमाल भारत में इतिहास में कई बार किया गया है और प्रायः यह विवादों और राजनीतिक असंतोष का विषय बना रहा है। विपक्षी दलों के तेवर इस बार भी साफ़ हैं कि ममता सरकार को कठोर आलोचनाओं का सामना करना पड़ेगा, वहीं टीएमसी नेता इसे “केंद्र की कोई साजिश” और राज्य की चुनावी स्वतंत्रता में दखल बताया रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक माहौल और भी गर्म होता दिख रहा है।

पश्चिम बंगाल के कानून-व्यवस्था-संबंधी हालात के विषय में पिछले कुछ समय से चर्चा जारी है। मुर्शिदाबाद जिले में हिंसक घटनाओं के बाद भी राज्य में राष्ट्रपति शासन की संभावना पर बहस हुई थी, जिसमें राजनीतिक दलों ने एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए थे। भाजपा का तर्क रहा कि यदि राज्य में निष्पक्ष चुनाव कराना मुश्किल है और पुलिस तथा प्रशासन तटस्थ नहीं है, तो राष्ट्रपति शासन के तहत स्थिति को सामान्य बनाना उचित होगा।

वहीं, टीएमसी ने हमेशा से जितना संभव हो केंद्र-नियंत्रित एजेंसियों के दखल को पार्टी की राजनीतिक गरिमा को चोट पहुँचाने वाला बताया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कई बार कहा है कि चुनाव की तैयारियाँ संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अंतर्गत होनी चाहिए और किसी भी तरह का “भ्रष्ट या अनुचित दबाव” स्वीकार्य नहीं है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह विषय और भी उग्र हो सकता है। भाजपा तथा अन्य विपक्षी दल टीएमसी सरकार पर आरोप लगाते हुए यह तर्क दे रहे हैं कि यदि हालात सामान्य नहीं हुए तो राष्ट्रपति शासन के तहत चुनाव कराना ही सही कदम होगा। दूसरी ओर, टीएमसी इसे राजनीतिक हथकंडा बता रही है और अपना रुख ज़ोरदार तरीके से बनाए हुए है।

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