
ईरान में गत दिसंबर 2025 से जारी विरोध-प्रदर्शन अब बड़े संघर्ष और हिंसा का रूप ले चुके हैं, जहाँ हजारों लोग जीवन और स्वतंत्रता की मांग करते हुए सड़कों पर हैं, वहीं देश की सत्तावादी नेतृत्व ने सुरक्षा बलों को ‘लाइव फायर’ यानी घातक गोलीबारी का निर्देश देने का बड़ा आरोप खुद शीर्ष नेतृत्व पर लगाया जा रहा है। इस हिंसक संघर्ष में अब तक मृतकों की संख्या लगभग 2,000 से अधिक बतायी जा रही है, जिसमें प्रदर्शनकारी और सुरक्षा बल दोनों शामिल हैं।
विरोध-प्रदर्शन की शुरुआत महंगाई, बेरोज़गारी, आर्थिक कठिनाइयों और शासन-विरोधी नारों के साथ हुई थी, लेकिन जल्द ही यह व्यापक राजनीतिक दबाव बन गया, जहाँ लोग सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह अली खामेनेई से भी असंतुष्ट हैं और बदलाव की मांग कर रहे हैं। विपक्षी समूहों और अत्यधिक संचार प्रतिबंधों के बीच खबरें बाहर आ रही हैं कि खामेनेई ने ही सख्त बल के इस्तेमाल का आदेश दिया था, जिससे सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर सीधे गोलियाँ चलाईं और हिंसा को भड़काया।
सुरक्षा बलों की कड़ी प्रतिक्रिया के चलते देश के प्रमुख शहरों में तीव्र झड़पें और गोलाबारी हुई, जिससे कई माहिर और आम नागरिक घायल हुए या मारे गए। सरकार ने इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क को बंद कर दिया है, जिससे देश के भीतर और बाहर वास्तविक स्थिति को समझना कठिन हो गया है। यह संचार ब्लैकआउट नागरिकों के साथ-साथ विश्व समुदाय को भी स्थानीय घटनाओं की निगरानी से वंचित कर रहा है।
ईरान के अधिकारियों ने आधिकारिक तौर पर इन मौतों की संख्या से इंकार नहीं किया है और विरोध प्रदर्शन को “आतंकवादियों और विदेशी योजनाओं का परिणाम” बताया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कुछ बाहरी ताकतें देश के अंदर अशांति फैलाने की कोशिश कर रही हैं। साथ ही, सरकार विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए सुरक्षा बलों और अर्धसैनिक इकाइयों को तैनात किये हुए है।
लेकिन मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय खबर एजेंसियों ने इस सिलसिले को बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत वाले दमन अभियान के रूप में वर्णित किया है और कहा है कि वास्तविक मौतों की संख्या कहीं अधिक हो सकती है क्योंकि इंटरनेट कटौती और सरकारी नियंत्रण के कारण वास्तविक समय में सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन और प्रतिक्रिया देखी जा रही है। कुछ विदेशी नेताओं ने ईरानी प्रदर्शनकारियों के लिए समर्थन की बात कही है और ईरान सरकार को अपनी नीति बदलने की चेतावनी दी है। वहीं संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने हिंसा के स्तर और संभावित बड़े दमन पर चिंता जताई है।
इन भीषण घटनाओं के कारण ईरानी जनता में भारी तनाव और भय का माहौल है, और आम लोगों की मांगें अब केवल आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहीं; बल्कि वे राजनैतिक और सामाजिक आज़ादी की ओर भी उन्मुख होती नजर आ रही हैं। इससे प्रतीत होता है कि ईरान के अंदर राजनीतिक स्थिरता और शासन के स्वरूप पर गहरा संकट उभर रहा है, जिसका प्रभाव न सिर्फ देश के भीतर बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति पर भी पड़ सकता है।



