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क्या UPSC IAS/IPS अधिकारी बनते-बनते इंजीनियरिंग का “टेक टैलेंट” गंवा रहा भारत?

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भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) जैसे प्रतिष्ठित सिविल सेवाओं में अब इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों का अभूतपूर्व दबदबा देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ सालों के डेटा से यह साफ़ संकेत मिलता है कि सिविल सेवा परीक्षा में चयनित अफ़सरों में से लगभग 55 से 65 प्रतिशत उम्मीदवार इंजीनियरिंग डिग्रीधारी हैं। विशेष रूप से प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे IIT दिल्ली और IIT कानपुर से सैकड़ों इंजीनियर सिविल सेवा अधिकारी बन चुके हैं, जिससे यह ट्रेंड और अधिक स्पष्ट हो गया है — एक तरह से कुछ इंजीनियरिंग कॉलेजों को “UPSC फैक्टरी” कहा जाने लगा है।

यह प्रवृत्ति समाज और नीति-निर्माता दोनों के लिए दोहरे अर्थ वाली चिंता पैदा कर रही है। एक तरफ़ इंजीनियरिंग से आए अधिकारी ई-गवर्नेंस, डिजिटल इंडिया, इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी नीतियों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, जिससे प्रशासन में तकनीकी दक्षता बढ़ रही है। दूसरी ओर, सवाल उठता है कि क्या देश उन संसाधनों और कौशलों का पूरा उपयोग कर पा रहा है जो इंजीनियरिंग शिक्षा में निवेश किए गए हैं। उदाहरण स्वरूप, एक IIT विद्यार्थी पर सरकार औसतन करोड़ों रुपये खर्च करती है; यदि वही शिक्षा इंजीनियरिंग क्षेत्र के बजाय प्रशासनिक सेवा में चली जाती है, तो क्या तकनीकी, शोध और उत्पादन-क्षेत्र में कमी नहीं आएगी?

इसके अलावा यह भी चिंता का विषय है कि जब अधिकांश अधिकारी इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से आते हैं, तो नीति-निर्माण और प्रशासन में समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, कृषि जैसे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व घट जाता है। विविध पृष्ठभूमि के अधिकारियों के अभाव में नीतियाँ एक सीमित सोच से निर्मित हो सकती हैं, जिससे व्यापक सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को समझने और हल करने में कठिनाई हो सकती है।

रोज़गार बाज़ार की स्थिति भी इस ट्रेंड का एक बड़ा कारण है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद गुणवत्तापूर्ण नौकरियों की कमी और निजी क्षेत्र में अस्थिरता नौजवानों को स्थिर सरकारी सेवाओं की ओर आकर्षित कर रही है। यह बदलाव न सिर्फ़ युवा पृष्टभूमि को प्रभावित कर रहा है, बल्कि देश की तकनीकी अर्थव्यवस्था और नवाचार क्षमता पर भी प्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है।

नीति-निर्माताओं के सामने अब यह चुनौती है कि कैसे सिविल सेवा में विविध पृष्ठभूमि और विशेषज्ञताओं को संतुलित करते हुए इंजीनियरिंग तथा अन्य तकनीकी क्षमताओं का अधिकतम सामाजिक उपयोग सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए शिक्षा नीतियों, UPSC चयन प्रक्रिया और संसाधन आवंटन में समग्रता पर विचार करना आवश्यक होगा।

इस विषय पर बहस यह भी दर्शाती है कि भारत को एक संतुलित, विविध और प्रभावी प्रशासनिक तंत्र बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ़ सिविल सेवाओं में अधिक इंजीनियर्स भेजना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि देश की तकनीकी शिक्षा के मूल लक्ष्यों — शोध, नवाचार और उत्पादन-क्षमता — को भी सुरक्षित रखना चाहिए।

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