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हेट स्पीच मामले पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश

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असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के कथित हेट स्पीच और विवादित वीडियो को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर आज उच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को साफ-साफ कहा कि वे कुछ नेताओं को निशाना बनाते हुए सीधे शीर्ष अदालत में न आएँ, बल्कि पहले क्षेत्राधिकार वाली हाई कोर्ट में अपना मामला दाखिल करें। अदालत ने यह भी चेतावनी दी कि संवैधानिक प्रक्रिया को दरकिनार करके सीधे सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने की प्रवृत्ति एक “राजनीतिक अखाड़ा” बनने का कारण बन रही है और इससे उच्च न्यायालयों के अधिकारों का दुर्बलकरण होता है।

मामला उस याचिका से जुड़ा है जिसमें विपक्षी दलों और न्यायिक हस्तियों ने सरमा के कथित हेट स्पीच और सोशल मीडिया पर वायरल हुए विवादित पोस्ट/वीडियो पर कानूनी कार्रवाई की मांग की थी। याचिका में यह आरोप लगाया गया कि असम के सीएम के भाषणों और वीडियो में एक विशेष समुदाय को लक्षित करने वाले कथित भड़काऊ बयानों का उपयोग किया गया, जिससे सामाजिक तनाव और वैमनस्य को बढ़ावा मिला है। इसमें एक वीडियो का भी जिक्र है, जिसमें सरमा को एक राइफल के साथ एक समुदाय की ओर लक्षित करते दिखाया गया था — वीडियो को बाद में पार्टी द्वारा हटाया गया, लेकिन उसकी प्रतियाँ और स्क्रीनशॉट विभिन्न प्लेटफार्मों पर घूम रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसका नेतृत्व चीफ जस्टिस सूर्यकांत कर रहे थे, ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों में अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट को प्राथमिक रूप से मौका देना चाहिए और सीधे शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा कि चुनाव जैसे समय में प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों द्वारा सुप्रीम कोर्ट को “राजनीतिक युद्ध का मैदान” बनाने की प्रवृत्ति चिंताजनक है और इससे संवैधानिक कानूनी प्रणाली प्रभावित हो सकती है।

न्यायालय ने याचिकाओं का न सिर्फ यह हवाला लेते हुए मज़बूत तरीके से खारिज़ किया कि हाई कोर्ट पूरी तरह सक्षम है इस तरह के मामलों को देखने के लिए बल्कि यह भी संकेत दिया कि बिना व्यापक और निष्पक्ष आधार के कुछ नेताओं को चुनकर केवल उन्हीं के खिलाफ कार्रवाई की मांग करना न्यायिक प्रक्रिया के दृष्टिकोण से सही नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को क्षेत्राधिकार वाली हाई कोर्ट का रुख करने का निर्देश देते हुए संवैधानिक रूप से निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने पर जोर दिया।

इस आदेश के बाद से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा तेज़ हो गई है। कुछ legal experts का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उच्च न्यायालयों को सशक्त करने और संवैधानिक ढांचे के भीतर न्यायिक चैनलों का सम्मान बढ़ाने का संकेत है। वहीं आलोचक यह भी कहते हैं कि ऐसे मामलों में समय पर न्याय देने की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से जब आरोप सांप्रदायिक भड़काऊ बयान जैसी संवेदनशीलता से जुड़े हों।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संविधान के तहत सभी व्यक्तियों तथा राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों को कानूनी और संवैधानिक जिम्मेदारियों के साथ बोलने और कार्य करने की आज़ादी है, लेकिन यदि किसी के बयानों से सामाजिक सौहार्द और संविधान की मूल भावना को चोट पहुँचती है तो वैधानिक चुनौती के लिए सही मंच का चुनाव करना आवश्यक है।

अब याचिकाकर्ताओं के पास विकल्प यह है कि वे गौहाटी हाई कोर्ट जैसे क्षेत्राधिकार वाले हाई कोर्ट में अपने अधिकार और शिकायतों को विस्तार से प्रस्तुत करें। अदालत ने हाई कोर्ट से इस मामले को तेज़ सुनवाई के साथ निपटाने का भी अनुरोध किया है, ताकि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सभी पक्षों के हितों और संवैधानाओं का समुचित सम्मान हो सके।

इस बीच राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के बीच इस मुद्दे पर बहस जारी है, साथ ही यह भी चर्चा में है कि ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा क्या होनी चाहिए और किस हद तक राजनीति और न्याय प्रणाली के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए।

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