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पश्चिम एशिया संकट के बीच मोदी सरकार का बड़ा फैसला

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केंद्र सरकार ने देश में बढ़ती महंगाई और संभावित खाद्य संकट को देखते हुए बड़ा आर्थिक फैसला लिया है। सरकार ने तत्काल प्रभाव से चीनी के निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) द्वारा जारी अधिसूचना में कच्ची चीनी, सफेद चीनी और रिफाइंड चीनी तीनों के निर्यात को प्रतिबंधित श्रेणी में डाल दिया गया है। सरकार का कहना है कि यह कदम घरेलू बाजार में पर्याप्त सप्लाई बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए उठाया गया है।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब अमेरिका-ईरान तनाव और पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट के कारण वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ी हुई है। तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव, सप्लाई चेन पर दबाव और खाद्य वस्तुओं की बढ़ती मांग को देखते हुए भारत सरकार सतर्क नजर आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक हालात और बिगड़ते हैं तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। ऐसे में सरकार पहले से ही घरेलू स्टॉक सुरक्षित रखना चाहती है।

सरकारी अधिसूचना के मुताबिक यह प्रतिबंध तुरंत लागू हो गया है और अगले आदेश तक जारी रह सकता है। हालांकि कुछ विशेष श्रेणियों को राहत दी गई है। यूरोपीय संघ और अमेरिका को निर्धारित कोटा के तहत होने वाले निर्यात, सरकार-से-सरकार समझौतों के अंतर्गत सप्लाई और पहले से बंदरगाहों पर पहुंच चुकी खेपों को छूट दी गई है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जिन निर्यात सौदों की प्रक्रिया पहले से शुरू हो चुकी थी, उन्हें विशेष शर्तों के तहत अनुमति दी जा सकती है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में शामिल है और ब्राजील के बाद प्रमुख निर्यातक देशों में गिना जाता है। पहले सरकार ने अनुमान लगाया था कि देश में उत्पादन पर्याप्त रहेगा और निर्यात से किसानों व चीनी मिलों को फायदा होगा। इसी आधार पर करीब 15.9 लाख मीट्रिक टन चीनी निर्यात की अनुमति दी गई थी। लेकिन बाद में कई राज्यों में गन्ने की पैदावार कमजोर रहने और मौसम संबंधी चिंताओं के कारण उत्पादन अनुमान घटने लगे।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार सरकार को डर है कि लगातार दूसरे साल घरेलू खपत उत्पादन से अधिक रह सकती है। अल नीनो प्रभाव और कमजोर मानसून की आशंका ने भी चिंता बढ़ा दी है। यही वजह है कि सरकार अब घरेलू बाजार को प्राथमिकता दे रही है। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतों में तेजी देखी गई और वैश्विक ट्रेडर्स की नजर भारत की नीति पर टिक गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले से भारत में चीनी की उपलब्धता बेहतर बनी रह सकती है और त्योहारों के मौसम में कीमतों पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी। हालांकि चीनी उद्योग से जुड़े कुछ कारोबारियों का मानना है कि निर्यात रुकने से मिलों की आय प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात में देश के उपभोक्ताओं और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देना जरूरी है।

आर्थिक जानकार इसे केवल एक व्यापारिक निर्णय नहीं बल्कि रणनीतिक कदम भी मान रहे हैं। उनका कहना है कि जिस तरह भारत ने पहले गेहूं और चावल के निर्यात पर नियंत्रण लगाया था, उसी तरह अब चीनी को लेकर भी सतर्क नीति अपनाई जा रही है। इससे घरेलू महंगाई को नियंत्रित करने और विदेशी संकट के असर को कम करने में मदद मिल सकती है।

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