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सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा मामला

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प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और शिक्षा सुधारक सोनम वांगचुक के अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे रहने के बीच उनकी सेहत को लेकर गंभीर चिंता सामने आई है। उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। याचिका में दावा किया गया है कि लगातार अनशन के कारण वांगचुक का वजन करीब 8.5 किलोग्राम तक कम हो चुका है और यदि तुरंत चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई तो अगले दो दिनों के भीतर उनकी जान को गंभीर खतरा हो सकता है।

याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार को निर्देश दिए जाएं कि सोनम वांगचुक को तत्काल किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जाए और आवश्यकता पड़ने पर उनकी जान बचाने के लिए आवश्यक चिकित्सकीय उपचार सुनिश्चित किया जाए। याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी भी नागरिक को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर संकट की स्थिति में बिना इलाज के छोड़ देना संविधान के तहत जीवन के अधिकार के विपरीत होगा। इसमें यह भी कहा गया है कि राज्य की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि नागरिक के जीवन की रक्षा करना भी उसका संवैधानिक दायित्व है।

बुधवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट ने याचिका की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा। अदालत ने मामले की तात्कालिकता को स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया और कहा कि इस मुद्दे पर शीघ्र सुनवाई की जाएगी। कोर्ट के समक्ष यह भी दलील दी गई कि यदि समय रहते चिकित्सा सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई तो स्थिति अपूरणीय हो सकती है।

सोनम वांगचुक पिछले कई दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। उनका आंदोलन शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों और हाल में सामने आए परीक्षा संबंधी विवादों को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग पर केंद्रित है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जब तक उनकी प्रमुख मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक वह अपना अनशन समाप्त नहीं करेंगे। हालांकि उनकी लगातार गिरती सेहत को देखते हुए विभिन्न सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों ने उनसे स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की अपील भी की है।

इस पूरे घटनाक्रम ने देशभर में भूख हड़ताल, लोकतांत्रिक विरोध और राज्य की जिम्मेदारियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक पक्ष का मानना है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अधिकार है, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि जब किसी प्रदर्शनकारी का जीवन गंभीर खतरे में हो, तब सरकार और प्रशासन को मानवीय आधार पर तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए। इसी प्रश्न को लेकर अदालत में भी विस्तृत कानूनी बहस होने की संभावना जताई जा रही है।

फिलहाल सभी की निगाहें दिल्ली हाई कोर्ट की आगामी सुनवाई और सरकार के जवाब पर टिकी हुई हैं। अदालत के निर्देशों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी, जबकि सोनम वांगचुक के समर्थक लगातार उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा और उनकी मांगों पर सकारात्मक समाधान की उम्मीद जता रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बना रह सकता है।

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