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5 दिन तक पेड़ से लिपटा रहा शख्स, बाढ़ के बीच ऐसे बचाई अपनी जान

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ओडिशा के भद्रक जिले से इंसानी जिजीविषा की हैरान करने वाली कहानी सामने आई है। बलिपाटना गांव के रहने वाले 35 वर्षीय सुनंदा बेहरा बाढ़ के तेज बहाव में बह गए थे और कई दिनों तक उनका कोई पता नहीं चला। करीब 5 दिनों तक वह बाढ़ के पानी के बीच एक ताड़ के पेड़ से लिपटे रहे। आखिरकार कुछ ग्रामीणों की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने ओडिशा डिजास्टर रैपिड एक्शन फोर्स (ODRAF) को सूचना दी। रेस्क्यू टीम ने बेहद कमजोर और थके हुए सुनंदा को सुरक्षित बाहर निकाला और अस्पताल पहुंचाया।

बताया गया कि सुनंदा 13 अगस्त के आसपास बाढ़ के तेज बहाव में बह गए थे। परिवार और ग्रामीणों ने उनकी काफी तलाश की, लेकिन उनका कोई सुराग नहीं मिला था। बाद में बाढ़ के पानी से घिरे बजापति मैदान के इलाके से नाव पर गुजर रहे ग्रामीणों ने एक व्यक्ति को पेड़ से चिपके देखा। करीब जाकर पता चला कि वह सुनंदा ही हैं। इसके बाद तुरंत ODRAF को जानकारी दी गई और बचाव अभियान शुरू किया गया।

रेस्क्यू के समय सुनंदा की हालत बेहद कमजोर थी। उनके हाथ-पैर कांप रहे थे और वह काफी थक चुके थे। रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने करीब 5 दिनों तक बिना भोजन के पेड़ का सहारा लेकर समय गुजारा। अस्पताल पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू किया और उनकी हालत गंभीर बताई गई।

सवाल यह उठता है कि आखिर इंसान इतने लंबे समय तक भोजन के बिना कैसे जीवित रह सकता है? इसके पीछे शरीर की प्राकृतिक सर्वाइवल प्रणाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। संकट के समय मस्तिष्क शरीर को हाई अलर्ट पर डाल देता है। एमिग्डाला खतरे को पहचानकर तनाव प्रतिक्रिया शुरू करता है और एड्रेनालिन तथा कोर्टिसोल जैसे हार्मोन शरीर को तत्काल खतरे से निपटने के लिए तैयार करते हैं। इससे दिल की धड़कन और सांस लेने की गति बढ़ सकती है और मांसपेशियों तक अधिक रक्त पहुंचता है।

जब लंबे समय तक भोजन उपलब्ध नहीं होता, तो शरीर अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल करने का तरीका बदल देता है। शुरुआत में शरीर ग्लाइकोजन के भंडार का इस्तेमाल करता है। इसके बाद वह ऊर्जा के लिए वसा को तोड़ने लगता है और कीटोन बनने लगते हैं। यह प्रक्रिया शरीर और मस्तिष्क को कुछ समय तक ऊर्जा उपलब्ध कराने में मदद करती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बिना भोजन के कई दिनों तक रहना सुरक्षित है। ऐसी स्थिति में कमजोरी, डिहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन का गंभीर खतरा रहता है।

सर्वाइवल के दौरान शरीर अपनी ऊर्जा बचाने के लिए कुछ गैर-जरूरी प्रक्रियाओं को धीमा कर सकता है। साथ ही तनाव और दर्द के बीच शरीर प्राकृतिक रसायन जैसे एंडोर्फिन भी छोड़ता है, जो दर्द की अनुभूति को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। मानसिक स्तर पर जीवित रहने की तीव्र इच्छा और उम्मीद भी व्यक्ति को मुश्किल परिस्थितियों में टिके रहने में मदद कर सकती है।

सुनंदा बेहरा की घटना इस बात का उदाहरण है कि बेहद खतरनाक परिस्थितियों में मानव शरीर और मस्तिष्क किस तरह अपने संसाधनों को जीवित रहने के लिए इस्तेमाल करते हैं। हालांकि ऐसी घटनाएं असाधारण होती हैं और इन्हें सामान्य मानवीय क्षमता नहीं माना जा सकता। बाढ़ जैसी स्थिति में तेज बहाव, ठंड, डिहाइड्रेशन, चोट और संक्रमण कुछ ही समय में जानलेवा साबित हो सकते हैं। इसलिए यह घटना एक असाधारण सर्वाइवल केस है, न कि लंबे समय तक बिना भोजन-पानी के रहने का सुरक्षित तरीका।

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