
दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में 5 मंजिला PG इमारत गिरने की घटना ने राजधानी में अवैध निर्माण और सुरक्षा मानकों की पोल खोल दी है। हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 12 लोगों को मलबे से सुरक्षित बाहर निकाला गया है। राहत और बचाव अभियान के दौरान मलबे को हटाकर लगातार लोगों की तलाश की गई।
हादसे के बाद फरार बताए जा रहे इमारत के कथित मालिक हरिराम गुप्ता को पुलिस ने राजस्थान के भिवाड़ी/रेवाड़ी इलाके से पकड़ लिया। पुलिस ने उनके खिलाफ गैर इरादतन हत्या और लापरवाही से जुड़े प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इमारत में किस तरह के निर्माण और मरम्मत कार्य चल रहे थे और हादसे से पहले सुरक्षा नियमों का पालन क्यों नहीं किया गया।
शुरुआती जांच में इमारत के ग्राउंड फ्लोर और बेसमेंट में चल रहे मरम्मत तथा निर्माण कार्य को हादसे से जोड़कर देखा जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक बेसमेंट में पानी जमा होने और वहां चल रहे काम के कारण इमारत की संरचना कमजोर हुई हो सकती है। हालांकि, हादसे की अंतिम वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।
यह इमारत छात्रों के रहने के लिए PG के तौर पर इस्तेमाल हो रही थी और सत्य निकेतन का इलाका दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के नजदीक होने के कारण बड़ी संख्या में छात्रों के लिए आवास का केंद्र है। हादसे के बाद कई परिवार अपने बच्चों की जानकारी के लिए अस्पतालों और घटनास्थल पर पहुंचे। कुछ परिवारों को लंबे समय तक अपने परिजनों की स्थिति की जानकारी नहीं मिल सकी।
हादसे के बाद दिल्ली सरकार ने प्रशासनिक स्तर पर भी कड़ी कार्रवाई की है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के निर्देश पर MCD के 5 अधिकारियों को निलंबित किया गया है। इनमें दक्षिणी क्षेत्र के डिप्टी कमिश्नर, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर, असिस्टेंट इंजीनियर और जूनियर इंजीनियर शामिल हैं।
जांच में आसपास की इमारतों को लेकर भी चिंता सामने आई है। अधिकारियों ने क्षेत्र में अतिरिक्त मंजिलों और कथित अनधिकृत निर्माण की जांच शुरू की है। रिपोर्टों के मुताबिक कई इमारतों में 4 मंजिल से ऊपर किए गए निर्माण को सील करने की कार्रवाई की जा रही है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि राजधानी के घनी आबादी वाले इलाकों में निर्माण नियमों की निगरानी आखिर कितनी प्रभावी है।
सत्य निकेतन हादसे ने दिल्ली में पुराने भवनों, PG और छात्रावासों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खासतौर पर उन इमारतों को लेकर चिंता बढ़ी है, जिनमें बिना पर्याप्त संरचनात्मक जांच के अतिरिक्त मंजिलें बनाई गईं या बेसमेंट और नींव में बदलाव किए गए। विशेषज्ञों की नजर में ऐसी इमारतों में छोटी सी निर्माण संबंधी गलती भी बड़े हादसे में बदल सकती है।
दिल्ली सरकार ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सार्वजनिक इस्तेमाल वाली इमारतों के नियमित स्ट्रक्चरल ऑडिट और सेफ्टी सर्टिफिकेट की व्यवस्था मजबूत करने की बात कही है। छात्र आवास, स्कूल और अन्य सार्वजनिक उपयोग वाली इमारतों की सुरक्षा जांच को लेकर नई नीति पर भी काम किए जाने की बात सामने आई है।
अब इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर इमारत में निर्माण या मरम्मत के दौरान नियमों की अनदेखी हुई थी, तो उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया। हादसे के बाद मालिक की गिरफ्तारी और MCD अधिकारियों पर कार्रवाई ने प्रशासनिक जवाबदेही का मुद्दा सामने ला दिया है। पुलिस और प्रशासन की जांच से यह स्पष्ट होना बाकी है कि इस हादसे के लिए वास्तविक रूप से कौन-कौन जिम्मेदार था और इमारत को रहने के लिए सुरक्षित कैसे माना गया।
सत्य निकेतन की यह घटना सिर्फ एक इमारत के गिरने की कहानी नहीं है। यह दिल्ली में तेजी से बढ़ते PG कल्चर, अनधिकृत निर्माण और भवन सुरक्षा की निगरानी के बीच मौजूद खामियों की गंभीर चेतावनी है। 7 लोगों की मौत के बाद अब उम्मीद है कि जांच केवल दोष तय करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ऐसी इमारतों की पहचान और सुरक्षा जांच पर भी ठोस कार्रवाई होगी।



