
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिता को लेकर की गई टिप्पणी पर राजनीतिक विवाद बढ़ता जा रहा है। अब समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रामगोपाल यादव ने भी इस बयान से असहमति जताई है। उन्होंने कहा कि राजनीति में भाषा पर संयम रखना जरूरी है और किसी प्रधानमंत्री के पिता के लिए इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। उनके बयान से इस विवाद पर विपक्षी दलों के बीच भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
रामगोपाल यादव से जब खरगे की टिप्पणी को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने कहा कि वह इस तरह की भाषा से सहमत नहीं हैं। उनके मुताबिक, राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन नेताओं को सार्वजनिक मंचों पर बोलते समय मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए। उन्होंने चिंता जताई कि यदि वरिष्ठ नेता ही इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करेंगे, तो दूसरे नेताओं से संयम की उम्मीद करना मुश्किल हो जाएगा।
यह विवाद बिहार की राजधानी पटना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान शुरू हुआ। कार्यक्रम बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की 139वीं जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। अपने संबोधन में खरगे चुनावी मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर भारतीय जनता पार्टी तथा चुनावी व्यवस्था पर सवाल उठा रहे थे। इसी दौरान सभा में मौजूद एक व्यक्ति की टिप्पणी के जवाब में खरगे ने प्रधानमंत्री के पिता का जिक्र करते हुए विवादित शब्द कहे।
खरगे की टिप्पणी का वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इसे प्रधानमंत्री के परिवार के प्रति अपमानजनक बताते हुए कांग्रेस अध्यक्ष से माफी की मांग की। भाजपा नेताओं का कहना है कि राजनीतिक बहस में व्यक्तिगत और पारिवारिक टिप्पणियों की जगह नहीं होनी चाहिए। इस मुद्दे पर कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी किए गए।
दूसरी ओर, कांग्रेस की ओर से खरगे के बयान के संदर्भ पर जोर दिया गया है। कर्नाटक के मंत्री और खरगे के बेटे प्रियांक खरगे ने 26 अक्टूबर को कहा था कि बयान को उस परिस्थिति में समझना चाहिए, जिसमें सभा के दौरान उन्हें बीच में टोका गया था। उन्होंने भाजपा पर राजनीतिक मुद्दे को बढ़ाने और अपने नेताओं के पुराने बयानों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया। इस तरह विवाद को लेकर दोनों दलों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रही हैं।
सभा में टिप्पणी करने वाले व्यक्ति ने भी बाद में सफाई दी थी। उसने दावा किया कि उसकी बात को गलत समझा गया और उसका आशय यह था कि जब तक देश में विद्रोह जैसी स्थिति नहीं होगी, तब तक मोदी सत्ता से नहीं जाएंगे। इस सफाई के बाद घटना के संदर्भ को लेकर भी चर्चा हुई। हालांकि, इस स्पष्टीकरण से खरगे की टिप्पणी पर उठा राजनीतिक विवाद समाप्त नहीं हुआ।
रामगोपाल यादव की प्रतिक्रिया इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस कई विपक्षी मुद्दों पर साथ नजर आते रहे हैं। इसके बावजूद सपा सांसद ने इस विशेष टिप्पणी का समर्थन नहीं किया। उनके बयान से यह स्पष्ट हुआ कि राजनीतिक सहयोग का अर्थ हर बयान से सहमत होना नहीं है। हालांकि, इस प्रतिक्रिया के आधार पर दोनों दलों के व्यापक राजनीतिक संबंधों में किसी बदलाव का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
विवाद के बीच राजनीतिक भाषा और सार्वजनिक संवाद की मर्यादा का मुद्दा फिर सामने आया है। एक ओर भाजपा ने खरगे से माफी की मांग की है, वहीं कांग्रेस की ओर से बयान के संदर्भ और राजनीतिक बहस के दौरान हुई घटना को सामने रखा गया है। रामगोपाल यादव ने इस बहस में भाषा के संयम को प्राथमिकता दी है और कहा है कि वरिष्ठ नेताओं को अपने शब्दों के चयन में सावधानी बरतनी चाहिए।
फिलहाल खरगे की टिप्पणी को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं जारी हैं। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि कांग्रेस अध्यक्ष इस मामले पर कोई नई प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं और क्या विवाद का असर विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक संवाद पर पड़ता है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर दिखाया है कि सार्वजनिक जीवन में नेताओं के बयान केवल तत्काल राजनीतिक बहस ही नहीं, बल्कि व्यापक जनचर्चा का विषय भी बन जाते हैं।



