
जस्टिस यशवंत वर्मा के बयानों पर सुप्रीम कोर्ट का अहम रुख
नई दिल्ली — सुप्रीम कोर्ट में ‘कैश कांड’ मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ जज जस्टिस यशवंत वर्मा और केंद्र सरकार-संसदीय प्रक्रियाओं के बीच कानूनी बहस आज (8 जनवरी 2026) एक नए मोड़ पर पहुंच गई। यह मामला दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर भारी मात्रा में जले हुए नोटों की बरामदगी से जुड़ा है, जिसने न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थानों के अधिकारों, जवाबदेही और जांच प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस विवाद की शुरुआत 14 मार्च 2025 को दिल्ली में जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास में लगी अग्नि से हुई, जब अग्निशमन विभाग के अधिकारियों को कथित तौर पर मौके से नकदी के पैकेट मिले। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक तीन-सदस्यीय आंतरिक जांच समिति गठित की और यशवंत वर्मा को न्यायिक दायित्वों से हटा दिया गया था। समिति की रिपोर्ट में संदिग्ध नकदी की जानकारी और जुड़ी परिस्थितियों का विस्तृत विश्लेषण किया गया, जिसने बाद में महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया को जन्म दिया।
अब अदालत में यशवंत वर्मा ने विशेष रूप से राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन के निर्णयों और अधिकारों को चुनौती दी है। उनका तर्क है कि जब चेयरमैन का पद खाली था, तब डिप्टी चेयरमैन के पास कुछ संवैधानिक रूप से सीमित अधिकार थे और ऐसे में किसी जांच समिति का गठन करना विधिक रूप से सही नहीं था। वर्मा की दलील थी कि यह निर्णय केवल तकनीकी आधार पर लिया गया और असहमत होने पर उसकी वैधता पर प्रश्न उठता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सुनते हुए कहा कि यदि उपराष्ट्रपति (Vice President), जो राज्यसभा के सभापति (Chairman) होते हैं, राष्ट्रपति की स्थिति में जज की नियुक्ति को मंज़ूरी दे सकते हैं, तो उसी शक्ति के आधार पर वह नियुक्ति को रद्द भी कर सकते हैं। कोर्ट ने यह समझाया कि सभापति और उपसभापति के संवैधानिक अधिकारों में ऐसे निर्णय शामिल हैं, और दोनों सदनों की सहमति से ही आगे की प्रक्रिया संभव है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर लोकसभा अध्यक्ष के नेतृत्व में जांच समिति का गठन हुआ है, तो उसके निर्णय की जाँच भी दोनों सदनों की सहमति के तहत ही संभव है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संसद के महाभियोग प्रस्ताव और जांच समिति जैसे संवैधानिक उपायों में प्रक्रिया और अधिकारों का संतुलन कैसे सुनिश्चित किया जाए ताकि न्यायिक जवाबदेही बनी रहे लेकिन संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान भी हो। सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दिया कि इस मामले में दोनों सदनों की सहमति और निर्णय प्रक्रियाएँ संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, और यही आधार जांच समिति के गठन की वैधता का निर्धारण करेगा।
अदालत ने यशवंत वर्मा की याचिका पर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया है और बताया कि आदेश जारी होने से पहले सभी संवैधानिक और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर गहन विचार किया जाएगा। जस्टिस वर्मा के वकीलों का दावा रहा है कि संसदीय समीति की वैधता और उपाध्यक्ष के अधिकारों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश आवश्यक हैं, जबकि विपक्षी पक्ष का तर्क है कि प्रक्रिया संवैधानिक रूप से पूरी हुई है और किसी भी चुनौती का आधार नहीं है।
यह मामला न केवल न्यायपालिका के पूर्व जज के खिलाफ Allegations को लेकर विवादित है, बल्कि यह संवैधानिक सत्ता संतुलन, संसद-न्यायपालिका संबंध और महाभियोग प्रक्रियाओं के दायरे को लेकर महत्वपूर्ण स्थापित हो सकता है। आगामी सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह निर्धारित होगा कि भारत के संवैधानिक ढांचे में जांच-पड़ताल और जवाबदेही का संतुलन किस दिशा में विकसित होगा।



