
छत्तीसगढ़ के Bastar जिले के बकावंड गांव से सामने आई खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। 26-year-old Lisa नाम की एक युवती — जिसे बचपन में ही अनाथ बताया जाता है — को उसकी “परिवार” द्वारा करीब 20 साल तक एक छोटे, अंधे कमरे में बंद रखा गया था। घटना की शुरुआत तब हुई थी जब वह मात्र 6 या 8 साल की थी। परिवार का कहना था कि वे उसे आस-पास के संदिग्ध व्यक्ति (मोलैस्टर या दरिंदे) से बचाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
उनकी इस “सुरक्षा” की कहानी धीरे-धीरे दासता में बदल गई — लिसा 20 साल तक धूप-धूल, हवा, स्कूल, दोस्त, जिंदगी — इन सबसे कट चुकी रही। इतने लम्बे अंधरे में रहने का खामियाजा उसकी सेहत पर भयानक तौर पर हुआ: रेस्क्यू के वक्त उसकी आंखों की रोशनी चली चुकी थी, वह बोलने-चलने में असमर्थ थी, और मानसिक रूप से भी टूट चुकी थी।
किस्से की भयावहता कुछ यूं थी — एक पिता, अपनी बेटी को बचाने की इच्छा में, उसे एक ऐसी कोठरी में बंद कर देता है जिससे न तो उसकी आवाज़ बाहर जाती, न उसका बचपन आगे बढ़ता। खाना-पीना, सोना-जागना, नहाना — सबकुछ उसी कमरे में। कमरा अँधेरा, खिड़की नहीं, रोशनी नहीं, हवा नहीं। धीरे-धीरे वो पूरी तरह सामाजिक व मानवीय संपर्क से कट गई।
बाद में जब Social Welfare Department (समाज कल्याण विभाग) को इस बात की जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत स्थानीय अधिकारियों के साथ पहुँचकर लिसा को उस अंधेरी “कैद” से छुड़ाया। अब लिसा को रेस्क्यू कर घरौंदा आश्रम में रखा गया है, जहाँ उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति का आकलन किया जा रहा है।
हालाँकि उसकी आंखों की रोशनी लौटने की संभावना बहुत कम है, और उसकी उम्र-बीता ज़िंदगी वापस नहीं आती — लेकिन वह अब धीरे-धीरे बोलने, चलने, खतरे और भय के बिना जीवन की ओर लौटने की राह पर है। उसकी कहानी बताती है कि कभी-कभी “सुरक्षा” का चोला गड़बड़ी और मानवाधिकारों के उल्लंघन में बदल जाता है।
इस घटना ने हमारी सामाजिक संवेदनशीलता और जागरूकता पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या डर व असुरक्षा के नाम पर हम बचपन व मानव गरिमा की कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं? सरकार, समाज व नागरिकों — सभी को चाहिए कि वे ऐसी अनदेखी को पकड़ें, ताकि कोई और लिसा न बने।



