
नई दिल्ली — शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में बुधवार देर रात एक बार फिर राजनीतिक तापमान बढ़ गया, जब विकसित भारत-गैरंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, 2025 यानी VB-G RAM-G Bill को पारित करने की प्रक्रिया के दौरान भारी हंगामा और विवाद देखने को मिला। इस विधेयक को सरकार के पक्ष में सदन में ध्वनिमत से मंज़ूर कर दिया गया, लेकिन विरोधी दलों के सांसदों ने कागज़ फाड़कर उन्हें फैलाने और संसद की कार्यवाही में व्यवधान पैदा करने जैसे अहितकारी कृत्यों का सहारा लिया, जिससे संसद की मर्यादा पर सवाल खड़े हो गए। विपक्षी सांसदों का यह आचरण सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहा है और इसे लोकतांत्रिक परंपराओं के विपरीत बताया जा रहा है।
केंद्रीय कृषि और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस विवादित घटना पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और इसे “निंदनीय” तथा लोकतंत्र के लिए कलंक बताया। उन्होंने कहा कि विपक्षी सांसदों के इस व्यवहार से संसद की गरिमा तार-तार हुई है और लोकतंत्र के मूल्यों को चोट पहुँची है। चौहान ने आरोप लगाया कि विपक्ष ने कागज़ फाड़े, टेबल पर चढ़ गए और सदन में बोलने की प्रक्रिया को बाधित किया, जिससे उन्हें जवाब देने का मौका तक नहीं मिल सका। उन्होंने विपक्ष पर लोकतंत्र को गुंडातंत्र में बदलने का आरोप भी लगाया।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि इस विधेयक पर लगभग 98 सांसदों ने विचार व्यक्त किए, लेकिन विपक्ष के अतिव्यवहार के कारण उन्होंने अपनी बात कहने का पर्याप्त अवसर नहीं पा सके। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या इस तरह के व्यवहार को लोकतांत्रिक आचरण कहा जा सकता है। मंत्री ने विपक्ष पर यह आरोप भी लगाया कि वे महात्मा गांधी के आदर्शों का अपमान कर रहे हैं, क्योंकि बिल के नाम और इसकी आकांक्षाओं को लेकर विपक्षी दलों का आरोप है कि इस विधेयक ने MGNREGA से गांधी का नाम हटाया है, जबकि सरकार का कहना है कि नया कानून ग्रामीण रोजगार और आजीविका व्यवस्था को और सुदृढ़ करेगा।
विपक्षी दलों ने VB-G RAM-G बिल के खिलाफ तीखी नाराज़गी जताई और इसे गरीब विरोधी और राज्यों पर वित्तीय बोझ डालने वाला बताया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने कहा कि यह विधेयक मनरेगा के मूल लक्ष्य, यानी ग्रामीण रोजगार की कानूनी गारंटी, को कमजोर कर सकता है। कुछ सांसदों ने विधेयक को स्टैंडिंग कमिटी या संयुक्त संसदीय कमिटी (JPC) को भेजने की मांग भी की, लेकिन अध्यक्ष ने कहा कि विधेयक पहले ही विस्तृत बहस के बाद प्रस्तुत किया गया है और उसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
संसद के भीतर विपक्ष के हंगामें के बावजूद यह विधेयक पारित कर दिया गया और अब इसे राज्यसभा में भेजा जाएगा जहां उसकी आगे की मंज़ूरी प्रक्रिया जारी रहेगी। इस पूरी घटना ने यह दर्शाया है कि लोकसभा में राजनीतिक खींचतान, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गहरे मतभेद, और आंदोलन-आरोप के मूड ने नीति निर्माण की प्रक्रिया को चुनौती दे दिया है। संसद की इस कच्ची बहस और अशिष्ट व्यवहार पर राजनीतिक विश्लेषक भी चिंता व्यक्त कर रहे हैं कि इस तरह के घटनाक्रम से लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।



